DA Image

अगली फोटो

Varuthini Ekadashi 2019: इस तारीख को है वरूथिनी एकादशी, दशमी से शुरू हो जाते एकादशी व्रत के नियम

लाइव हिन्दुस्तान टीम, नई दिल्ली
lord vishnu
शरीर का सेहत चक्र दुरुस्त करने वाले व्रत एवं उपवासों का सनातन धर्म में बड़ा ही महत्व है। हर व्रत की अपनी अलग महिमा है और उसके फल केवल जीवनकाल में सांसारिक न होकर परलोक तक मिलते हैं। ऐसे व्रतों में से एक है वरूथिनी एकादशी का व्रत, जो वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। इस व्रत को सौभाग्य प्रदान करने वाला व्रत माना जाता है। इस व्रत में भगवान विष्णु के वाराह अवतार की पूजा अर्चना की जाती है। इस व्रत को रखने वाले मनुष्यों के भगवान सारे कष्ट हर लेते हैं और उन्हें सुख समृद्धि देते हैं। वरूथिनी एकादशी का व्रत सौभाग्य प्रदान करने वाले होता है लेकिन इस व्रत को नियमानुसार रखा जाना चाहिए। इससे व्रत रहने वाले व्यक्ति को मनवांछित फल प्राप्त होता है। मान्यता है कि इस व्रत को रखने से इस लोक के साथ परलोक में भी पुण्य मिलता है।
vishnu
दशमी से शुरू हो जाते एकादशी व्रत के नियम : वरूथिनी एकादशी का व्रत धारण करने से एक दिन पहले अर्थात दशमी तिथि से ही उपवास रखने वाले व्यक्ति को नियमों का अनुपालन करना पड़ता है। ऐसे दस नियम हैं, जिनका पालन दशमी को करना होता है, क्योंकि एकादशी व्रत की शुरुआत दशमी को रात का भोजन करने के बाद शुरू हो जाती है। जबकि समापन द्वादशी को सुबह ब्राह्मणों को भोजन कराने और दान दक्षिणा देने के बाद होता है। व्रत रहने वाले को मांस, मसूर की दाल, चना, करौंदे, शाक, शहद नहीं खाना चाहिए। कांसे के बर्तन, मांगकर और दूसरी बार भोजन नहीं करना चाहिए। भोजन में नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिए। अगर संभव हो तो व्रत रहने के दौरान भगवान विष्णु की प्रतिमा के पास धरती पर ही सोना चाहिए।
ऐसे धारण करें व्रत : अगर आपको वरूथिनी एकादशी का व्रत धारण करना है तो सबसे पहले सुबह उठकर स्नान करें और फिर उपवास रहने का संकल्प करें। इसके बाद भगवान श्री हरि विष्णु भगवान की पूजा की जाती है। घडे़ पर लाल रंग का वस्त्र बांधकर, उस पर भगवान श्री विष्णु जी की पूजा, धूप, दीप और पुष्प से की जाती है। इससे जातक को अच्छे फल की प्राप्ति होती है।
वरूथिनी एकादशी की व्रत कथा : प्राचीन समय में नर्मदा नदी के किनारे मान्धाता नाम के राजा रहते थे। राजा का धर्म निभाने के साथ ही वह जप तप करते रहते थे। साथ ही प्रजा के प्रति दयाभाव रखते थे। एक बार वह तपस्या में लीन थे तो एक भालू ने उनका पैर चबा लिया और राजा को जंगल की ओर खींचकर ले गया। तब राजा ने विष्णु भगवान से प्रार्थना की। भक्त की पुकार सुनकर पहुंचे विष्णु भगवान ने अपने चक्र से भालू को मार डाला। लेकिन राजा का पैर भालू ने नोचकर खा लिया था। इस बात का राजा को बहुत दुख था। राजा को दुखी देखकर विष्णु भगवान ने कहा कि राजन भालू ने जो तुम्हारा पैर काटा है। वह तुम्हारे पूर्व जन्म का पाप है, जिसकी सजा तुम्हें इस जन्म में भुगतनी पड़ रही है। राजा ने इससे मुक्ति पाने का उपाय पूछा तो भगवान विष्णु ने कहा कि राजन, तुम मेरी वाराह अवतार मूर्ति की पूजा वरूथिनी एकादशी का व्रत धारण करके करो। इससे तुम्हारे पाप कट जाएंगे और व्रत के प्रभाव से दोबारा अंगों वाले हो जाआगे। इसके बाद राजा ने वरुथिनी एकादशी का व्रत धारण किया तो उनका पैर फिर से सही हो गया
lord vishnu
श्रेष्ठ दान का फल देती वरूथनी एकादशी : मान्यता है कि इस व्रत को धारण करने से इस लोक के साथ परलोक में भी सुख की प्राप्ति होती है। माना जाता है कि घोड़े के दान से हाथी का दान करना श्रेष्ठ है, हाथी के दान से भूमि का दान श्रेष्ठ है। इन सभी में श्रेष्ठ तिलों का दान करना है। सोने का दान तिल के दान से श्रेष्ठ है। स्वण् र के दान से श्रेष्ठ अन्न-दान है। अन्न-दान से श्रेष्ठ कोई भी दान नहीं है। अन्न-दान से मानव, देवता, पितृ सभी को तृप्ति मिल जाती है। शास्त्रों के अनुसार कन्यादान को भी अन्न दान के बराबर माना जाता है। सबसे सुंदर है श्रेष्ठ आचरण भगवान श्रीराम जी को यूं ही मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं कहा जाता है। उन्होंने अवतार लेने के दौरान मानव रूप में सदैव नैतिक मूल्यों का पालन कर आदर्श स्थापित किये। श्रीराम, उनके भाई लक्ष्मणजी और माता सीता के बीच हुई बातचीत का यह प्रसंग बेहद प्रेरणादायी है।
  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Varuthini Ekadashi 2019: Varuthini Ekadashi date pooja vidhi and ekadashi vrat katha