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आज है स्त्रियों के लिए बेहद खास ऋषि पंचमी, जानें क्या है पूजा का शुभ मुहूर्त, विधि और कथा

लाइव हिन्दुस्तान टीम, नई दिल्ली
rishi panchami vrat 2019
हिन्दू पंचाग के अनुसार आज ऋषि पंचमी का व्रत है। यह व्रत हर साल गणेश चतुर्थी के अगले दिन और हरतालिका तीज व्रत के ठीक दूसरे दिन भाद्र पद की शुक्ल पंचमी को रखा जाता है। यह व्रत महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत रखने वाली सुहागिन महिलाओं को मनचाहे फल की प्राप्ति होती है।
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ऋषि पंचमी का व्रत करने से अनजाने में हुए हर पाप से भी व्यक्ति को मुक्ति मिल जाती है। ऋषि पंचमी को भाई पंचमी नाम से भी जाना जाता है। इस व्रत में सप्त ऋषियों की पूजा की जाती है। इस साल यह व्रत 3 सितंबर, दिन मंगलवार यानि की आज मनाया जा रहा है।
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ऋषि पंचमी पूजा का शुभ मुहूर्त- ऋषि पंचमी के दिन पूजा करने का शुभ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 5 मिनट से दोपहर 1 बजकर 36 मिनट तक रहेगा। जिसके अनुसार व्रत रखने वाले व्रती इस अवधि के दौरान पूरे 2 घंटे 31 मिनट तक पूजा और कथा को सुनकर अपनी मनोकामना पूरी कर सकते हैं।
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ऋषि पंचमी की पूजा के दौरान करें इन मंत्रों का जाप- कश्यपोत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोय गौतम:। जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषय: स्मृता:।। गृह्णन्त्वर्ध्य मया दत्तं तुष्टा भवत मे सदा।।
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ऋषि पंचमी की पूजा विधि- ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार ऋषि पंचमी के दिन महिलाओं को घर की साफ-सफाई करके विधि विधान के साथ 7 ऋषियों के साथ देवी अरुंधती की स्थापना करनी चाहिए। इस दिन व्रती को सूर्योदय से पहले उठकर सबसे पहले स्‍नान करने के बाद साफ हल्के पीले वस्‍त्र धारण करने चाहिए।
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पूजा शुरू करने से पहले घर के मंदिर को गंगाजल से शुद्ध करके वहां धूप-अगरबत्ती जलाएं. - एक लकड़ी के पटरे पर सप्त ऋषियों की तस्वीर लगाकर उनके सामने जल से भरा हुआ एक कलश रख दें। - सप्‍त ऋषि को धूप-दीपक दिखाकर पीले फल-फूल और मिठाई अर्पित करें।
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- अब सप्त ऋषियों से अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांगे और दूसरों की मदद करने का संकल्प लें। - सभी लोगों को व्रत कथा सुनाने के बाद आरती करना बिल्कुल न भूलें। इसके बाद पूजा में उपस्थित सभी लोगों को प्रसाद बांट दें। - पूजा करने के बाद अपने बड़े बुजुर्गों के चरण स्पर्श करके उनका आशीर्वाद लें।
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ऋषि पंचमी व्रत की कथा- पौराणिक कथाओं के अनुसार विदर्भ देश में उत्तंक नामक एक सर्वगुण संपन्न ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी सुशीला बेहद पतिव्रता थी। इस ब्राह्मण दंपति का एक पुत्र और एक पुत्री थी। लेकिन बेटी का विवाह होने के कुछ ही दिनों बाद वह विधवा हो गई। जिसके बाद दुखी ब्राह्मण दम्पति अपनी पुत्री के साथ गंगा तट पर ही एक कुटिया बनाकर रहने लगे।
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एक दिन ब्राह्मण पुत्री सो रही थी कि अचानक उसका शरीर कीड़ों से भर गया। जिसे देख माता सुशीला परेशान हो अपने पति के पास पहुंची। उसने अपनी पुत्री की यह गति होने का कारण पति से पूछा। इस समस्या का हल खोजने के लिए जैसे ही उत्तंक समाधि में बैठे उन्हें पता चला कि पूर्व जन्म में भी वह कन्या उनकी ही पुत्री थी। इसने रजस्वला होते ही बर्तन छू लिए थे।
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इस जन्म में भी इसने ऋषि पंचमी का व्रत नहीं किया। जिसकी वजह से उसके शरीर में कीड़े पड़ गए हैं। धर्म-शास्त्रों के अनुसार रजस्वला स्त्री पहले दिन चाण्डालिनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी तथा तीसरे दिन धोबिन के समान अपवित्र होती है और वह चौथे दिन स्नान करने के बाद शुद्ध होती है।
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यदि यह पवित्र मन से अब भी ऋषि पंचमी का व्रत करें तो इसके सारे दुख दूर हो जाएंगे और अगले जन्म में अटल सौभाग्य को प्राप्त करेगी। पिता की आज्ञा से पुत्री ने विधि- विधान से ऋषि पंचमी का व्रत एवं पूजन किया। इस व्रत के प्रभाव से वह सारे दुखों से मुक्त हो गई। अगले जन्म में उसे अटल सौभाग्य सहित सभी सुखों का भोग किया।
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ऋषि पंचमी व्रत का महत्व- माना जाता है कि यह व्रत अगर दिल से किया जाए तो जीवन के सारे दुख समाप्त हो जाते हैं। अविवाहित युवतियों के लिए यह व्रत विशेष फलदायी माना जाता है। इस दिन हल से जोते हुए अनाज का सेवन नहीं किया जाता है। इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है।
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  • Web Title:Today Rishi Panchami is very special for women, know what is the auspicious time of worship, method and story