भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी ये 10 रोचक बातें हर भक्त को पता होनी चाहिए

Jagannath rath yatra Facts: भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा 16 जुलाई से प्रारंभ हो रही है। इस यात्रा में शामिल होने के लिए देश के साथ विदेशों से भी भक्त आते हैं। आइए जानते हैं इस रथ यात्रा से जुड़ी खास बातें।

Saumya TiwariJul 15, 2026 01:12 pm IST
1/11

भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी रोचक बातें

जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई 2026 से प्रारंभ हो रही है और इसका समापन 24 जुलाई को होगा। इस दौरान भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अलग-अलग रथों पर सवार होकर गुंडीचा मंदिर जाते हैं। इस रथ यात्रा में देश-दुनिया के अलग-अलग कोने से भक्त रथ की रस्सियां खींचने के लिए शामिल होते हैं। मान्यता है कि रथ यात्रा के दर्शन करने मात्र से भक्त को पापों से मुक्ति मिल जाती है। रथ यात्रा की रस्सियों को खींचने से सभी तीर्थ के समान पुण्य प्राप्त होता है। आइए जानते हैं भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी ये 10 रोचक बातें।

2/11

नीम की लकड़ी से बनाए जाते हैं रथ

रथ में प्रयोग होने वाली लकड़ी को 'दारु' (अत्यंत पवित्र लकड़ी) कहते हैं। इसके लिए नीम के स्वस्थ और शुभ पेड़ की पहचान की जाती है, जिसके लिए जगन्नाथ मंदिर एक खास समिति का गठन करती है।

3/11

रथ में नहीं लगाई जाती है एक भी कील

रथों के निर्माण में किसी भी प्रकार की कील या कांटे या अन्य किसी धातु का प्रयोग नहीं किया जाता है। इन रथों के लिए लकड़ी का चयन बसंत पंचमी के दिन से शुरू होता है और उनका निर्माण अक्षय तृतीया से प्रारंभ होता है।

4/11

तीनों विशाल रथों के क्या नाम हैं

भगवान जगन्नाथ, अपने बड़े भाई प्रभु बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ अलग-अलग भव्य रथों पर सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं। इन तीनों रथों को लकड़ी से पूरी शुद्धता के साथ तैयार किया जाता है। भगवान जगन्नाथ के रथ का नाम नंदीघोष या गरुड़ध्वज है, जो कि पीले और लाल रंग के कपड़ों से सजाया जाता है। प्रभु बलभद्र के रथ का नाम तालध्वज है, जिसका रंग लाल और हरा होता है। बहन सुभद्रा के रथ को दर्पदलन (पद्म रथ) कहा जाता है, यह लाल और काले रंग के कपड़ों से सजाया जाता है।

5/11

गुंडीचा मंदिर क्यों जाते हैं भगवान जगन्नाथ

तीनों भाई-बहन अपने भव्य रथों पर सवार होकर गुंडीचा मंदिर की ओर आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को प्रस्थान करते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, गुंडीचा मंदिर भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर माना जाता है। इस जगह को गुंडीचा तीर्थ या जनकपुरी के नाम से भी जानते हैं। 9 दिनों तक मौसी के घर विश्राम करने के बाद भगवान अपने मुख्य धाम को लौटते हैं। इस वापसी यात्रा को बाहुदा यात्रा रथयात्रा कहा जाता है।

6/11

सोने की झाड़ू से मार्ग की होती है सफाई

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकालने से पहले 'छेरा पहरा' की रस्म अदा की जाती है। इस रस्म के तहत पुरी के गजपति राजा पालकी में यहां आते हैं और तीनों रथों की विधिपूर्वक पूजा करते हैं और सोने की झाड़ू से रथ और रथ मार्ग को साफ करते हैं। इसके बाद रथ यात्रा प्रारंभ होती है।

7/11

रथों की कितनी होती है ऊंचाई

भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ 45.6 फीट ऊंचा, बलभद्र जी का तालध्वज रथ 45 फीट ऊंचा और देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ 44.6 फीट ऊंचा होता है।

8/11

सबसे आगे किनका होता है रथ

रथ यात्रा में सबसे आगे भगवान बलभद्र जी का रथ, बीच में देवी सुभद्रा का रथ और सबसे पीछे बगवान जगन्नाथ का रथ होता है। इसे उनके रंग और ऊंचाई से पहचाना जाता है।

9/11

रथ यात्रा में शामिल होने से क्या फल मिलता है

रथ यात्रा को लेकर मान्यता है कि जो रथ की रस्सियों को खींचता है उसे समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है। सभी सुखों को भोगकर अंत में विष्णु लोक को जाता है।

10/11

मुसलमान भक्त की मजार के सामने रुकता है रथ

रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ जी का रथ एक मुसलमान भक्त सालबेग की मजार के सामने रुकता है। कहा जाता है कि पुरी में सालबेग भक्त का नाम महाप्रभु जगन्नाथ के महान भक्तों में शामिल है।

11/11

एकादशी के दिन विशेष श्रृंगार

भगवान जगन्नाथ, प्रभु बलभद्र और देवी सुभद्रा के मुख्य मंदिर पहुंचने के बाद एकादशी के दिन तीनों देवताओं को सोने के आभूषणों से सजाया जाता है, इस परपंरा को 'सोना बेषा' कहा जाता हैं।

Hindi Newsफोटोपंचांग-पुराणभगवान जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी ये 10 रोचक बातें हर भक्त को पता होनी चाहिए