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हिम्मत हो तो किसी से नहीं लगता डर

हिम्मत हो तो किसी से नहीं लगता डर

गुवाहाटी में पली-बढ़ी संयुक्ता को शुरू से खेलों और सांस्कृतिक गतिविधियों में रुचि थी। मां ने उनकी इन खूबियों को पूरी शिद्दत से निखारा। पिता दुलाल चंद्र बरुआ सिंचाई विभाग में इंजीनियर थे और मां मीना देवी असम स्वास्थ्य  विभाग में नौकरी कर रही थीं। परिवार में बेटे-बेटी के बीच भेदभाव कभी नहीं किया गया। खेल प्रतियोगिताओं के दौरान मां और भाई, दोनों उनका उत्साहवर्द्धन करते। मां ने हमेशा समझाया कि वह किसी से कम नहीं। बचपन के दिनों को याद कर संयुक्ता कहती हैं, बचपन बहुत खूबसूरत था। मां ने मुझे और भाई को बराबर मौके दिए। उन्होंने मुझे हिम्मत और सम्मान के साथ जीना सिखाया। शुरुआती पढ़ाई गुवाहाटी के होली चाइल्ड स्कूल में हुई। 12वीं पास करने के बाद सपनों को उड़ान देने का वक्त आ गया। बुलंद इरादों के साथ वह दिल्ली पहुंचीं। देश की राजधानी उनके अपने शहर गुवाहाटी से बिल्कुल अलग थी। दिल्ली यूनिवर्सिटी में देश के अलग-अलग इलाकों से आए छात्रों से मिलने का मौका मिला। सब कुछ नया था। कुछ दिक्कतें भी आईं। शुरुआत में हॉस्टल में जगह नहीं मिली। वह राजनीति शास्त्र से स्नातक करने के बाद अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर मास्टर की डिग्री लीं। वैश्विक राजनीति व अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में उनकी दिलचस्पी बढ़ रही थी। लिहाजा शोध करने का फैसला किया। जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी से पीएचडी की। शोध का विषय था: अमेरिकी-एशियाई रिश्ते।

पीएचडी करने के बाद वह वर्ष 2004 में ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में काम करने लगीं, इसी दौरान यूपीएससी परीक्षा की तैयारी शुरू की। काम के साथ वह रोजाना कम से कम पांच घंटे पढ़ाई करती थीं। उन्हें परीक्षा में पास होने की पूरी उम्मीद थी, पर यह नहीं सोचा था कि 85वीं रैंक आ जाएगी। सफलता सुखद आश्चर्य की तरह आई। अगर वह चाहतीं, तो आईएएस बनकर आरामदायक जीवन जी सकती थी, पर उन्होंने कठिन रास्ता चुना। वह आईपीएस अफसर बनकर देश की सेवा करना चाहती थीं। असम के अशांत क्षेत्रों में सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालना काफी मुश्किल था। पर संयुक्ता ने दिलेरी के साथ इस चुनौती को स्वीकार किया। जल्दी ही वह अपने निर्भीक अंदाज के लिए पूरे असम में मशहूर हो गईं। संयुक्ता कहती हैं, 'मुझे लगता है कि मैंने आईपीएस अफसर बनकर अच्छा किया। पुलिस अफसर होने के नाते आपको पीडि़त लोगों की मदद करने का मौका मिलता है। यह बेहतरीन सेवा है। यह नौकरी मुझे सुकून देती है।'

साल 2008 में माकुम इलाके में बतौर सहायक कमांडेंट उनकी पहली पोस्टिंग हुई। पद संभाला ही था कि अचानक एक आदेश आया। तैनाती के बस दो घंटे के अंदर ही उनसे कहा गया कि उन्हें उदालगुरी पहुंचना है। उस समय उदालगुरी इलाका हिंसा की लपटों में झुलस रहा था। वहां उन्हें एहसास हुआ कि हिंसा और नफरत लोगों को कैसे तबाह कर देती है। संयुक्ता पहली बार जातीय झगड़ों की हकीकत से रू-ब-रू हुईं। हालात पर काबू पाने के लिए उन्होंने टीम के संग डटकर काम किया। यह उनकी पहली परीक्षा थी और उनका प्रदर्शन बेहतरीन रहा। इसी साल उन्होंने पुरु गुप्ता से शादी की। उनके पति भी आईपीएस अधिकारी हैं और आजकल वह चिरांग जिले के डिप्टी कमिश्नर हैं। दोनों का एक बेटा है। काम के सिलसिले में बाहर जाने की वजह से अक्सर परिवार से कई दिनों तक दूर रहना पड़ता है। संयुक्ता कहती हैं, 'पत्नी  होने के अलावा मैं मां भी हूं। पर पुलिस अफसर होने के नाते समाज के प्रति मेरी अहम जिम्मेदारी है।'

इस समय संयुक्ता सोनितपुर जिले की एसपी हैं। उन्होंने असम के जंगलों में बोडो उग्रवादियों के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है। पिछले कुछ महीनों में उनके नेतृत्व में चलाए गए अभियानों में कई उग्रवादी मारे गए और दर्जनों गिरफ्तार हुए हैं। इन अभियानों के बाद उग्रवादी उनके नाम से खौफ खाने लगे हैं। घने जंगलों के बीच छिपे उग्रवादियों को खोज निकालना अपने आपमें बड़ी चुनौती है। वैसे घने जंगल ही पुलिस-फोर्स के लिए मुश्किलें खड़ी नहीं करते, बल्कि  जंगली पशुओं से भी बड़ा खतरा रहता है। इसके अलावा, दुर्गम इलाकों में अभियान के दौरान नदियों व झीलों को पारकर दूसरे छोर तक पहुंचना भी एक जटिल काम है। संयुक्ता ने ऐसे जोखिम भरे इलाकों में कई बड़े अभियानों का सफल नेतृत्व किया है। अक्सर लोग उनसे सवाल करते हैं कि क्या आपको डर नहीं लगता? एक महिला होकर कैसे इतना जोखिम वाला काम कर लेती हैं? संयुक्ता मानती हैं कि 'महिला होना कोई बाधा नहीं है। यह सब भ्रम है। महिला हो या पुरुष, पुलिस सेवा में हम सबको समान अधिकार और जिम्मेदारियां मिली हैं। मुझे कहीं कोई फर्क या भेदभाव नजर नहीं आता। किसी महिला को कठिन चुनौती मिली है, तो यह अच्छी बात है। बिना डरे हमें खुद को तैयार करना चाहिए।' अपनी बहादुरी के लिए वह लड़कियों की रोल मॉडल बन गई हैं। पिछले दिनों संयुक्ता ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा, देश को जहीन और बहादुर युवाओं की जरूरत है। ज्यादा से ज्यादा लड़कियों को पुलिस सेवा में आना चाहिए। 
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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