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3 जून, 2020|12:29|IST

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मैं समझती हूं गरीबी का दर्द

विओला का जन्म अमेरिका के साउथ कैरोलिना के एक गांव में हुआ। वहां उनके दादा-दादी का पैतृक घर था। परिवार के हालात ऐसे नहीं थे कि मां को अस्पताल ले जाया जाता। इसलिए नर्स ने घर पर ही उनका जन्म कराया। यह छह नाती-पोते वाला एक बड़ा संयुक्त परिवार था। समय के साथ बच्चों की जरूरतें बढ़ीं, तो मम्मी-पापा ने गांव छोड़कर रोड आइलैंड के सेंट्रल फॉल्स शहर में बसने का फैसला किया। 

विओला परिवार के संग शहर आ गईं, जबकि उनकी दो बहनें दादी के साथ गांव वाले घर में रहने लगीं। पिता डेन डेविस ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे। लिहाजा उन्हें कोई अच्छी नहीं मिल पाई। गुजारा करने के लिए कुछ तो करना था। उन्हें घुड़सवारी का शौक था। इसीलिए जल्द ही उन्हें घोड़ों को ट्रेनिंग देने का काम मिल गया। हालांकि इस काम में ज्यादा कमाई नहीं थी। वेतन से बच्चों को पालना और उन्हें पढ़ाना संभव नहीं था। इसलिए मां मेरी एलिस भी पास की एक फैक्टरी में मजदूरी करने लगीं। कुछ दिनों तक उन्होंने पड़ोस के घरों में चौका-बर्तन का काम भी किया। किसी तरह गुजारा चल रहा था। दो बच्चे  गांव में रह गए थे, पर चार उनके साथ थे। तमाम मुश्किलों के बावजूद पापा ने चारों बच्चों को स्कूल भेजा, क्योंकि वह जानते थे कि पढ़ाई ही वह रास्ता है, जिसकी मदद से बच्चों को बेहतर जिंदगी दी जा सकती है। विओला सेंट्रल फॉल्स हाईस्कूल में पढ़ने लगीं। तब वह छह साल की थीं। वहां ज्यादातर गरीब परिवारों के बच्चे ही पढ़ने आते थे। बावजूद इसके बच्चों में श्वेत और अश्वेत भेदभाव की भावना हावी थी। चुलबुली स्वभाव की विओला को स्कूल में मजा आने लगा। खासकर सुबह की प्रार्थना सभा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को लेकर वह बहुत उत्साहित रहने लगीं। जैसे ही क्लास टीचर बच्चों से डांस या नाटक में हिस्सा लेने को कहतीं, तो विओला चहकते हुए अपना नाम दर्ज करा देतीं। उन्हें कई नाटकों में अहम रोल निभाने का मौका मिला। बाकी बच्चों की तरह उन्हें कभी स्टेज पर झिझक महसूस नहीं हुई।

टीचर नन्ही विओला की अदाकारी और बेबाक अंदाज के कायल थीं। स्कूल में वह काफी खुश थीं, पर घर की आर्थिक तंगी उन्हें काफी परेशान करने लगी। अक्सर घर में एक वक्त भी खाना नहीं बन पाता था। विओला बताती हैं, हमने गरीबी में दिन गुजारे। मैं देश के उन बदनसीब बच्चों में थी, जिन्हें यह नहीं पता होता था कि अगली सुबह खाना नसीब होगा या नहीं? हम सब भाई-बहनों ने इस दर्द को झेला है। माता-पिता का संघर्ष जारी था और बच्चों का भी। अक्सर विओला जब स्कूल से घर लौटतीं, तो रसोईघर में बर्तन खाली मिलते। बाकी भाई-बहनों का भी यही हाल होता। तब वह पड़ोस में रहने वाले दोस्तों के घर किसी न किसी बहाने से पहुंच जातीं। विओला बताती हैं, हमारी कॉलोनी में कुछ बच्चे ऐसे थे, जिनकी मां सुबह-शाम का नाश्ता और दोपहर का खाना बनाती थीं। मैं अचानक खाने के वक्त उनके घर पहुंच जाती थी, ताकि मुझे भी खाना मिल जाए। बचपन बड़ी दुश्वारियों में बीता। गनीमत यह रही कि तमाम अभावों के बावजूद उनकी पढ़ाई जारी रही। इस बीच धीरे-धीरे स्कूल में उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी। सब उनके अभिनय की तारीफ करते थे। हाईस्कूल पास करते ही उन्होंने एक्टिंग सीखने का फैसला लिया। बाद में रोड आइलैंड कॉलेज में थियेटर की ट्रेनिंग ली। कॉलेज में ट्रेनिंग के दौरान स्टेज शो करने लगीं। अब उनका आत्मविश्वास बढ़ चुका था। वह तय कर चुकी थीं कि अब उन्हें अभिनेत्री ही बनना है।

साल 1996 में द सब्सटांस ऑफ फायर फिल्म में ब्रेक मिला। फिल्म में उन्होंने नर्स का रोल किया। रोल बहुत छोटा था, पर फिल्म इंडस्ट्री में पहचान बनाने में मददगार रहा। इसके बाद कई टीवी शो में रोल मिले। वर्ष 2000 में सिटी ऑफ एंजेल्स  में नर्स लिनेटी पीलर का किरदार निभाया। वर्ष 2001 में किंग हेडली द्वितीय  नाटक में अहम किरदार मिला। इसमें उन्हें अदाकारी के लिए सर्वश्रेष्ठ फीचर अभिनेत्री का अवॉर्ड मिला। कामयाबी का सफर बढ़ता गया। साल 2008 में फिल्म डाउट  में मिसेज मिलर के किरदार से नई पहचान बनी। इसके लिए उन्हें ऑस्कर अवॉर्ड के लिए नामित किया गया। 

तमाम शोहरत और बुलंदियों के बीच विओला अपने पुराने दिनों को नहीं भूलीं। शोहरत और दौलत कमाने के साथ वह गरीब बच्चों की मदद करने लगीं। अपने पुराने स्कूल को उन्होंने आर्थिक मदद पहुंचाई। विओला कहती हैं, हम दुनिया के अमीर देश हैं। लेकिन हमारे प्राइमरी स्कूल में पढ़ने वाले प्रत्येक पांच गरीब बच्चों में से तीन को भूख से जूझना पड़ता है। क्या हमारे लिए यह चिंता और शर्म की बात नहीं है? मैं नहीं चाहती कि जो कुछ मैंने बचपन में सहा, वह बाकी बच्चों को भी सहना पड़े। विओला को हाल में गोल्डन ग्लोब अवॉर्ड से नवाजा गया है। अवॉर्ड लेते हुए उन्होंने कहा, अश्वेत होने या महिला होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। बात सिर्फ एक अवसर की है। हम गरीब थे, पर हमारे माता-पिता ने कभी हमारा हौसला नहीं टूटने दिया। उस हौसले के बल पर ही आज मैं यहां तक पहुंची हूं।

प्रस्तुति : मीना त्रिवेदी