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बढ़ते आतंकी हमले

आईजी पुलिस ने फरमाया है कि हाल के वर्षों में मुल्क पर आतंकी हमले तेज हुए हैं। वाकई आतंकी घटनाओं के बढ़ते आंकड़े हमें फिक्रमंद होने को कहते हैं, मगर फिलहाल हम यह जानना चाहते हैं कि आतंक की कमर तोड़ने के लिए हुकूमत किस तरह के ठोस कदम उठा रही है। उग्रवाद को मुंहतोड़ जवाब देने की माकूल रणनीति का न होता एक गंभीर मुद्दा तो है ही, मगर इसे दरकिनार भी कर दें, तो आतंकी घटनाओं के बढ़ने की एक बड़ी वजह दहशतगर्दों से संबंधित मामलों के ट्रायल और उनके खिलाफ होने वाली जवाबी कार्रवाइयों में नरमी है।

साल 2013 के बाद से तकरीबन 37 हमले सेक्युलर ब्लॉगरों, लेखकों व मजहबी भाईचारे के पैरोकारों पर हुए हैं। मगर अब तक सिर्फ एक मामले में ही फैसला आया है और चार अन्य में महज चार्ज-शीट दाखिल हुई है। क्यों? इन तमाम हमलों को आखिर उन्हीं लोगों ने अंजाम दिए हैं, जो हमारी अपनी जमीन की उपज हैं और मुल्क में लगातार खूनी गतिविधियों का प्रसार कर रहे हैं। साफ है, ऐसे असामाजिक लोग न सिर्फ मुल्क की सेक्युलर छवि के लिए खतरा हैं, बल्कि आम लोगों में मजहबी सीमा से ऊपर उठकर सोचने की राह को भी मुश्किल बना रहे हैं।

पुलिस का यह कहना कि वह इसके मुतल्लिक कार्रवाई कर रही है, और इसी वजह से अब ज्यादा हमले नहीं हो रहे, दरअसल इस सिक्के का एक पहलू है। असल में, हम यह दर्ज करना भूल रहे हैं कि इसी साल 2016 के शुरुआती चार महीने में ही हमले की नौ वारदात हो चुकी हैं, जबकि साल 2015 में ऐसी तीन घटनाएं हुई थीं। यह साफ संकेत है कि अतिवादियों के हौसले पहले से काफी ज्यादा बढ़ गए हैं। संभवत: इसकी वजह आतंकी हमलों से जुड़े मामलों के जल्द निपटारे में हमारी नाकामी है। इस कारण से ऐसे हमले खतरनाक दर से बढ़ रहे हैं। लिहाजा यह वक्त इस तथ्य पर गौर करने का है कि अतिवादियों के रूप में हमारे सामने एक ठोस खतरा मौजूद है, और उनके नापाक इरादों को कुंद करने का एक ही तरीका है कि ऐसी गतिविधियों से संबंधित तमाम मामलों की अदालती प्रक्रिया जल्दी से जल्दी पूरी हो।   
द डेली स्टार, बांग्लादेश

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  • Web Title:terrorist attacks antisocial people