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सीरियाई शांति-वार्ता का भविष्य

रूस आगे बढ़ते हुए सीरिया में एक और दखलंदाजी भरा कदम उठाने जा रहा है। मास्को और दमिश्क ने सोमवार को 85 करोड़ यूरो के एक करारनामे पर दस्तखत किए हैं, जो युद्ध में लिप्त इस मुल्क के ध्वस्त बुनियादी ढांचे को दुरुस्त करने पर खर्च किए जाएंगे। यह समझौता बताता है कि सदर बशर अल-असद अपने भविष्य को लेकर काफी आश्वस्त-से हैं।

गौरतलब है कि असद को व्लादिमीर पुतिन से भरपूर माली व फौजी मदद मिली, जिसने सीरिया की जंग की तस्वीर ही बदल दी। असद की फौजों के पांव तेजी से उखड़ने लगे थे और वे विद्रोहियों व आईएस के हाथों एक के बाद दूसरा इलाका गंवाती जा रही थीं। लेकिन रूस की मदद से उन्होंने न सिर्फ अपने खोए हुए इलाकों में से कुछ पर फिर से नियंत्रण स्थापित किया, बल्कि विरोधियों के आगे कड़ी चुनौती पेश करने में भी वे सक्षम हुईं।

सीरियाई फौजों ने छिट-पुट हमलों के बीच अपने नियंत्रण वाले इलाकों पर कमोबेश अपना दबदबा बनाए रखा है, और इस हकीकत ने असद हुकूमत को संयुक्त राष्ट्र की पहल पर जारी शांति-वार्ता में गैर-मुनासिब मांग करने को प्रेरित किया है। असद की सत्ता को रेडलाइन मानकर ही कोई बातचीत करने की मांग निहायत बेतुकी है, क्योंकि सीरियाई क्रांति की शुरुआत ही असद को हटाकर मुल्क में जम्हूरियत बहाल करने के लिए हुई थी।

रूसी सहायता तो बस शुरुआत है। इस समझौते से जो पैगाम दुनिया भर में गया है, वह यह है कि असद हुकूमत मुल्क के पुननिर्माण के बारे में सोच रही है। इसमें एक और ताकतवर संदेश है कि असद विरोधी गुटों और उनके समर्थकों के हाथों से वक्त तेजी से फिसलता जा रहा हैै और यदि वे अपनी ताकत इकट्ठा नहीं करते, तो उनकी पराजय ज्यादा दूर नहीं है। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र प्रायोजित शांति-वार्ता का भविष्य अब भी अनिश्चय के भंवर में फंसा हुआ है। चूंकि दोनों पक्ष अपने रुख नरम करने को तैयार नहीं हैं, ऐसे में इसके विफल होने की सूरत साफ नजर आ रही है। उधर, असद विरोधी खेमों और उनके अरब समर्थकों को ओबामा से निर्णायक मदद की दरकार है, लेकिन ओबामा इसमें उलझने से हिचक रहे हैं।
द पेनिन्सुला, कतर

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