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सूखे की आशंका

पाकिस्तान में सूखे जैसे हालात ने जिंदगी मुहाल कर दी है। कपास किसानों और बलूचिस्तान व थारपरकर की आबादी के लिए मुसीबत दिन दुनी-रात चौगुनी बढ़ रही है। साउथ एशियन क्लाइमेट फोरम ने जो नई भविष्यवाणी जारी की है, उसमें इस साल मानसून में 'सामान्य से कम बारिश' की चेतावनी साफ-साफ है, जो जाहिर तौर पर खेती-किसानी पर टिकी इकोनॉमी के लिए खतरनाक इशारा है। हालांकि, ये मौसमी भविष्यवाणियां सच साबित न होने के लिए बदनाम हैं, इसलिए खामियों के पिटारे से उम्मीद की किरण दिखाई देती है। मगर साल 2010 से पाकिस्तान ने मानसून के बुरे तजुर्बे ही हासिल किए हैं। हर गुजरते साल ने सैलाब के कहर को महसूस किया है, जिससे लाखों लोगों की जिंदगी पर बुरा असर पड़ा, इन्फ्रास्ट्रक्चर को नुकसान हुआ और फसलें तबाह हुईं। और हर बार पाकिस्तान को इससे उबरने के लिए अंतरराष्ट्रीय मदद की दरकार पड़ी। यह तो साफ है कि मौसमी मार पर हुकूमत का जोर नहीं, मगर कुछ काम ऐसे भी हैं, जिनको करने से इसका असर घट जाता है।

सबसे पहले तो पाकिस्तान को गुणवत्तापूर्ण मौसमी भविष्यवाणी की जरूरत है। मसलन, पाकिस्तान के मौसम विभाग ने भविष्यवाणी सात अप्रैल को जारी की थी कि आधे जून तक मुल्क के सभी इलाकों में औसत या औसत से ज्यादा बारिश होगी, जबकि कुछ हफ्ते पहले हिन्दुस्तान के मौसम विभाग ने सूखे के खतरे को लेकर आगाह किया और साउथ एशियन क्लाइमेट आउटलुक फोरम ने तो 27 अप्रैल को ही औसत से कम बारिश होने की आशंका जता दी थी। अब जाकर पाकिस्तान के मौसम विज्ञान विभाग के मुखिया ने यह कहा है कि 'मुल्क के दक्षिणी इलाके में, जो पहले से ही सूखे जैसे हालात का सामना कर रहा है, उम्मीद से कम बारिश होने की आशंका है।' इसकी बजाय, उन्हें तो यह बताना चाहिए कि क्यों इतनी देर से भविष्यवाणी होती है? इसी तरह, बाढ़ की आशंका के मामले में भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। 'फ्लड एलर्ट' जारी होने के पहले महज 48 घंटे का नोटिस मिलता है और बीते पांच बरसों में बाढ़ से जुड़ी हमारी तैयारियां भी बदतर रही हैं।  
द डॉन, पाकिस्तान

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