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लोकतंत्र के लिए

जम्हूरियत के सिपाही हांगकांग में एक ठहराव के बाद फिर से उठ खड़े हुए हैं। राजनीतिक सुधार पैकेज पर वोट से पहले ही हांगकांग इस मुद्दे पर बंट गया है और इसके विरोध में बड़ी तादाद में लोग सड़कों पर उतरने लगे हैं। इस विवादित सुधार पैकेज के तहत तय होना है कि हांगकांग का अगला नेता किस तरह से चुना जाना चाहिए। इस पर पिछले बुधवार को विधायिका में चर्चा हुई और इस सप्ताह के अंत तक इसे पारित किया जाएगा। लोकतंत्र-समर्थक हांगकांगवासी चाहते हैं कि चुनाव प्रक्रिया को और अधिक ‘लोकतांत्रिक’ होना चाहिए, जबकि चीन की सरकार वहां पर लोकतंत्र लागू करने की इच्छुक नहीं है। गौरतलब है कि चीन सरकार हांगकांग की प्रभारी है। सन 1997 में ब्रिटेन द्वारा चीन को सौंपे जाने के बाद से ही हांगकांग एक अद्र्ध-स्वायत्त क्षेत्र है। हांगकांग के लोगों को चीनियों के मुकाबले कहीं ज्यादा आजादी हासिल है, मगर इस बात की भी आशंका है कि उनसे यह आजादी छीनी जा सकती है। हांगकांग के लोग उस आजादी को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और चीन से ज्यादा अधिकार पाना चाहते हैं। पिछले साल के अंतिम दिनों में लाखों की तादाद में लोकतंत्र-समर्थक लोग सड़कों पर उतर आए थे। वह आंदोलन चीन के इस प्रस्ताव के विरोध में खड़ा हो गया था कि जो लोग 2017 का चुनाव लड़ना चाहते हैं, उनकी अच्छी तरह से जांच-पड़ताल की जानी चाहिए। मौजूदा विरोध प्रदर्शन के आयोजकों का कहना है कि इस बार भी लोग भारी संख्या में उनके प्रदर्शन में शामिल होंगे, लेकिन वे पिछली बार की तरह इस बार सड़कों पर कब्जा करना नहीं चाहते।

चीन में लोकतंत्र-समर्थक आंदोलन को काफी बुरे दिन देखने पड़ रहे हैं। उसके दुश्मन दुर्जेय व दृढ़-संकल्प वाले हैं और वे जन-आंदोलनों की कोई परवाह नहीं करते। अलबत्ता, हांगकांग में उम्मीद की एक किरण अब भी बची है कि विधायिका में डेमोक्रेट्स के पास इतने वोट हैं कि वे इस सुधार पैकेज को रोक दें।... ब्रिटेन के प्रभार काल में हांगकांग के लोग आजादी का स्वाद चख चुके हैं, और अब वे उसकी हिफाजत के लिए हर हाल में लड़ेंगे।
द पेनिन्सुला, कतर

 

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