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अमेरिका की इराक-नीति

पिछले हफ्ते राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कुछ हैरान करने वाले अंदाज में कहा कि इराक और सीरिया में आईएसआईएस को शिकस्त देने के लिए अमेरिका के पास अभी 'अचूक रणनीति' नहीं है। पेंटागन से जारी आंकड़े इस स्वीकृति पर मुहर लगाते हैं। बीते अगस्त से, जब इस कथित खिलाफत के विरुद्ध हवाई हमले शुरू हुए, पूरे फौजी ऑपरेशन का खर्च 2.7 बिलियन डॉलर रहा, यानी हर दिन औसतन 9.1 मिलियन डॉलर खर्च हुए। यह आंकड़ा सुनने में बड़ा लगा सकता है, लेकिन हाल के अमेरिकी युद्धों के स्तर और 600 बिलियन डॉलर से अधिक के पेंटागन के बजट को देखते हुए यह ऊंट के मुंह में जीरा ही है। अमेरिकी प्रशासन ने हाल ही में घोषणा की है कि 450 अतिरिक्त अमेरिकी जवान इराक भेजे जाएंगे। साफ है कि इससे खर्च अपने आप बढ़ जाएगा। यह भी संभव है कि वहां फौज को प्रशिक्षण देने के लिए और लोग जाएं तथा आने वाले महीनों में ज्यादा फौजी ठिकाने स्थापित हों, ताकि इराकियों को सलाह और सहायता, दोनों मिल सके। लेकिन ऐसे तरीके जवाब कम देते हैं, और सवाल अधिक उछालते हैं।

इराक में कुछ सौ अतिरिक्त फौजी जूतों के जमीन पर उतर पड़ने से युद्ध का स्तर नहीं बदल जाएगा। बल्कि, यह इराकी प्रधानमंत्री हैदर अल-अबादी के लिए एक तरह से न्यूनतम अमेरिकी मदद है। गौरतलब है कि पिछले दिनों पेंटागन के एक शीर्ष कमांडर ने यह सनसनीखेज टिप्पणी की थी कि जब मई में आतंकवादी संगठन आईएसआईएस का आक्रमण हुआ, तब रमादी को बचाने की इच्छा इराकी फौज में नहीं जगी। आईएसआईएस को परास्त करने के लिए अधिक बड़ा और अधिक मजबूत अमेरिकी हस्तक्षेप की जरूरत है। लेकिन इस तरह का कोई भी कदम अमेरिकी जनता नहीं चाहती और वह इसका लगातार विरोध कर रही है। इस बिंदु पर यह साफ लगता है कि अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के पास रणनीति है। ऐसा लगता है कि अमेरिकी साख की रक्षा के लिए वहां न्यूनतम कदम उठाए जाएंगे, साथ ही, मध्य-पूर्व (भारत से पश्चिम एशिया) के किसी भी विध्वंसकारी युद्ध में अमेरिका अपना हाथ नहीं डालेगा।  
द इंडिपेंडेंट, ब्रिटेन

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