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एक नया समझौता

नए संविधान से जुड़े बकाया मसलों पर तीन बड़ी पार्टियों व एमजेएफ-जनतांत्रिक का 16-सूत्री समझौते पर पहुंचना एक बड़ी राजनीतिक सफलता है। फिर भी, कुछ बुनियादी सवालों की यह अनदेखी करता है, जिन्होंने संविधान-निर्माण की प्रक्रिया को इतने लंबे वक्त तक लटकाए रखा। नया समझौता कहता है कि संघीय ढांचे में आठ प्रांत होंगे, जो पहचान व व्यावहारिकता के आधार पर गठित होंगे। लेकिन यह साफ नहीं है कि आखिर उन्होंने प्रांतों की संख्या आठ ही क्यों रखी, खासकर तब, जब अब तक उनके नाम या सीमाओं के नक्शे को लेकर कोई सहमति नहीं बन पाई है? संघवाद पर हुआ समझौता काफी अस्पष्ट है, क्योंकि राजनीतिक रूपरेखा इतनी अस्पष्ट है कि तकनीकी आयोग इस पर सवाल कर सकता है। इसका एक मतलब यह भी निकलता है कि सियासी पार्टियों को एक बार फिर संघीय ढांचे के व्यापक प्रारूप पर करार करना होगा। यह एक संकेत है कि नेपाली समाज अब भी किस हद तक धु्रवीकृत है।एक अस्पष्ट समझौते की तीखी आलोचना में वामपंथी व दक्षिणपंथी, दोनों उतर आए। जहां तक वामपंथियों का प्रश्न है, तो पहचान पर आधारित संघवाद के इसके समर्थकों को भय है कि समझौते से संघवाद का एजेंडा पूरी तरह से हाशिये पर चला जाएगा। वे सोचते हैं कि नए संविधान की घोषणा के साथ ही भविष्य में किसी लेन-देन के अधिकर से वे वंचित हो जाएंगे और यह एजेंडा दीर्घकाल के लिए ठंडे बस्ते में ठेल दिया जाएगा। वहीं, कुछ दक्षिणपंथी मानते हैं कि आठ सूबों पर आधारित मॉडल एक माओवादी प्रस्ताव है और नेपाली कांग्रेस व सीपीएन-यूएमएल अनावश्यक ही उसके जाल में फंस गए हैं। वास्तव में, अस्पष्ट प्रस्ताव ने अनेक लोगों को इस समझौते को अपनी आशंकाओं के अनुरूप परिभाषित करने की छूट दे दी है। इसलिए पार्टियों को तत्काल समझौते के विभिन्न पहलुओं पर अपना रुख साफ करें। अगर नाम व बाउंड्री का मसला भविष्य के झोले में डाला जाता है, तब भी यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि संघीय मॉडल में पहचान के सवाल का हल कैसे किया जाएगा? इस संदर्भ में जो भी दरारें हैं, वे तुरंत भरी जानी चाहिए।
द काठमांडू पोस्ट, नेपाल

 

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