DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

तुर्की में लोकतंत्र की जीत

रविवार को हुए संसदीय चुनाव में तुर्की के मतदाताओं ने एक बार फिर लोकतंत्र में अपनी आस्था का इजहार किया है। तुर्की के कुल मतदाताओं में से 86 प्रतिशत से भी अधिक वोटरों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया, जो 2012 में अमेरिकियों की चुनावी भागीदारी से काफी ज्यादा है। तब 57 प्रतिशत अमेरिकियों ने ही अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया था। तुर्की के मतदाताओं ने अपने जनादेश के जरिये यह साफ कर दिया है कि वे राष्ट्रपति तईप एर्दोगन को, जो लगातार एक तानाशाह नेता के रूप में उभर रहे हैं, अब और अधिक शक्ति हासिल नहीं करने देंगे। मतदाताओं ने उन्हें संसदीय चुनाव में बहुमत नहीं दिया है, बल्कि अल्पसंख्यक कुर्दों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी को अच्छी-खासी संख्या में सीटें दी हैं। एर्दोगन के लिए ये परिणाम बड़े झटके की तरह हैं, जिन्हें अब गठबंधन सरकार बनाने की चुनौती से दो-चार होना पड़ेगा। एर्दोगन ने इस चुनाव को अपने ऊपर जनमत संग्रह बना दिया था और आखिरकार परिणामों ने उनकी आभा काफी फीकी कर दी है। हालांकि, वह अब भी राष्ट्रपति रहेंगे, और देश के सबसे दुर्जेय राजनेता भी। उनकी जस्टिस ऐंड डेवलपमेंट पार्टी के पास, जिसे एकेपी के नाम से जाना जाता है, 550 सदस्यों वाली संसद में 327 सीटें थीं।

इस बार उसे 258 सीटें ही मिली हैं। पिछले 13 वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ है कि उनकी पार्टी को संसद में बहुमत हासिल नहीं है। इस चुनाव परिणाम का मतलब यह भी है कि एर्दोगन अपने कार्यालय को और ताकतवर बनाने के लिए जो सांविधानिक बदलाव करना चाहते थे, उसके लिए अब संसद में जरूरी संख्या उनके पास नहीं है। आने वाले हफ्ते अस्थिर और अनिश्चितताओं से भरे होंगे। यदि कोई गठबंधन सरकार नहीं बन पाई, तो दोबारा चुनाव कराना अनिवार्य हो जाएगा। अगर कोई सरकार गठित हुई भी, तब भी विशाल चुनौतियां सामने रहेंगी ही। जैसे, जड़ता की शिकार अर्थव्यवस्था, सीमावर्ती इलाकों के राहत शिविरों में रह रहे 20 लाख सीरियाई शरणार्थी और तुर्की के कुर्दों व पश्चिम के साथ मुश्किल संबंध, जिनको सुधारने की जरूरत है।
द न्यूयॉर्क टाइम्स, अमेरिका

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:तुर्की में लोकतंत्र की जीत