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कामयाब दौरा

अपने पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश के साथ जिन समझौतों की कोशिश हिन्दुस्तान अरसे से करता आ रहा था, यकीनन उन पर मुहर और बड़ी कामयाबियों के साथ उसके वजीर-ए-आजम ढाका से रवाना हुए होंगे। लंबे वक्त से अटका हुआ जमीन-सीमा समझौता अपने मुकाम पर पहुंचा। इसके अलावा, रिकॉर्ड तादाद में 22 करार हुए, सहमति-पत्र पर दस्तखत किए गए और पुराने वादे फिर से अमल में लाने के हालात पैदा हुए। यह सब हुआ है, उस गर्मजोशी भरे स्वागत के शामियाने से, जिसे हमारी हुकूमत और बांग्लादेश के अवाम ने हिन्दुस्तानी वजीर-ए-आजम नरेंद्र मोदी, पश्चिम बंगाल की मुखिया ममता बनर्जी और पूरे प्रतिनिधि मंडल के लिए ताना था। मीडिया ने मोदी के दौरे को एक जलसे के तौर पर लिया और अपनी रिपोर्टों में दोनों देशों के बीच बने माहौल की जमकर सराहना की। सुर्खियों में रहा- 'एक नए दौर का आगाज', 'उम्मीदों से लबरेज दौरा' और 'रिश्तों के नए आयाम का खुलना।' इन सबसे माहौल कुछ यूं बना कि मोदी को बदलाव के सकारात्मक प्रभाव के तौर पर देखा गया। बुनियादी रूप से, हम मोदी पर बतौर 'अ मैन ऑफ एक्शन' यकीन करते हैं। हम मानते हैं कि वह चीजों को दुरुस्त करने के प्रति दृढ़ हैं।

इसी सोच के साथ हम उनके इस भरोसेमंद बयान का स्वागत करते हैं कि तीस्ता और फेनी नदियों से जुड़े विवादों के हल जरूर होंगे। इनमें 'इंसानी मसले' तो हैं ही, साथ में, नदी के किनारे बसे मुल्क के हक के सवाल भी हैं। चार साल पहले, जब मनमोहन सिंह हिन्दुस्तान के वजीर-ए-आजम थे, तब जमीन-सीमा समझौते और तीस्ता मसले पर करार होता हुआ लगा था। लेकिन अफसोस तीस्ता नदी इस देरी से अब भी मुक्ति नहीं पा सकी है। नरेंद्र मोदी का सत्ता में बैठी पार्टियों से परे हटकर तमाम बड़े सियासतदानों से मिलना वास्तव में एक दुरुस्त सियासी कदम है। खास तौर पर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की नेता खालिदा जिया से उनकी मुलाकात को इसी रूप में देखा जाना चाहिए। हम इस बड़ी उम्मीद के साथ नरेंद्र मोदी की तरफ देख रहे हैं कि वह बांग्लादेश-हिन्दुस्तान रिश्तों के मामले में अपनी 'पड़ोस नीति' को अमल में लाएंगे।  
द डेली स्टार, बांग्लादेश

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