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एक गंवा दिया गया मौका

संयुक्त राज्य अमेरिका और दूसरी परमाणु शक्तियां परमाणु निरस्त्रीकरण पर हाल ही में आयोजित संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन का लाभ उठाने से वंचित रह गईं। मई में बुलाई गए इस बैठक का लक्ष्य था, परमाणु हथियारों में कटौती के वैश्विक प्रयासों को मजबूती देना। लेकिन यह बैठक परमाणु हथियारों के भविष्य और इन हथियारों को खत्म करने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए, इस पर गहरे मतभेदों को ही उजागर कर गई। सन 1970 में परमाणु अप्रसार संधि होने के बाद हर पांचवें साल यह सम्मेलन होता है, ताकि इस संधि के पालन की समीक्षा की जा सके। इस समझौते को एनपीटी के नाम से जाना जाता है, जिसके तहत पांच देशों को परमाणु शक्ति के रूप में चिन्हित किया गया था- अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस। और इन देशों ने परमाणु निरस्त्रीकरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई थी। इस संधि पर हस्ताक्षर करने वाले दूसरे 186 देशों ने वचन दिया था कि वे परमाणु हथियारों के बारे में नहीं सोचेंगे। लेकिन न तो इजरायल ने ऐसा किया और न ही दक्षिणी सूडान ने। उत्तर कोरिया ने, जो एनपीटी का एक सदस्य देश था, अपनी सदस्यता वापस ले ली। माना जाता है कि उसके पास 16 परमाणु बम हैं। चार सप्ताह तक कटु तर्क-वितर्क और आरोपों-प्रत्यारोपों के बाद 22 मई को इस वर्ष का सम्मेलन विफल हो गया। सदस्य देश एक औपचारिक कार्रवाई-योजना पर तक सहमत नहीं हो सके। इसके सभी फैसले आम सहमति से ही होने चाहिए, जबकि अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा ने अंतिम विज्ञप्ति को अस्वीकृत कर दिया। इस सम्मेलन के विफल होने का एक कारण था इजरायल और मिस्र के बीच विवाद, जिसका अमेरिका ने समर्थन किया कि मध्य-पूर्व में परमाणु हथियारों पर पूर्ण प्रतिबंध होना चाहिए। परमाणु हथियार मुक्त क्षेत्र के मुद्दे पर मिस्र और इजरायल एक-दूसरे से पहले भी टकरा चुके हैं। 2010 के एनपीटी समीक्षा सम्मेलन में क्षेत्रीय परमाणु प्रतिबंध के मुद्दे पर वर्ष 2012 में बैठक बुलाने की मांग की गई थी, जिस पर इजरायल उखड़ गया था। एक आशा की किरण ईरान के मोर्चे पर दिख रही है। उसमें सफलता मिली, तो नया रास्ता खुल सकता है।
द न्यूयॉर्क टाइम्स, अमेरिका

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