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हथियार बनते बच्चे

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष यानी यूनीसेफ की ताजा रिपोर्ट ने बच्चों की जिस दशा का खुलासा किया है, वह विचलित करने वाली है। यह रिपोर्ट बताती है कि किस तरह नाइजीरिया, कैमरून, चाड और नाइजर में बच्चों का इस्तेमाल इस्लामी आंदोलनों में हो रहा है, और किस तरह से उन्हें आत्मघाती हमलावर बनाया जा रहा है।

यह रिपोर्ट इस बात का तकलीफदेह ब्योरा है कि हम अपने बच्चों के साथ कैसा सुलूक कर रहे हैं। अलबत्ता, सबसे ज्यादा परेशान करने वाली सूचना यह है कि आत्मघाती हमलावर के रूप में इस्तेमाल किए जा रहे बच्चों में तीन-चौथाई लड़कियां होती हैं। उन्हें आतंकी गुटों द्वारा जबरन घरों से उठाया जा रहा है, और फिर घातक हमलों को अंजाम देने के लिए तैयार किया जा रहा है। कोई भी बच्चा अपनी मर्जी से ऐसा नहीं करना चाहता; वे दूषित धार्मिक प्रतिबद्धता के शिकार युवा हैं, जो अपनी आतंकी मंशा पूरी करने के लिए युद्ध-बलि के रूप में इन मासूमों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

बच्चों को चूंकि प्रभावित करना आसान होता है और किसी भी वयस्क के मुकाबले उन्हें आसानी से भटकाया जा सकता है, इसलिए उनकी अनमोल जिंदगी के साथ इस तरह से खिलवाड़ हो रहा है। यह मानव सभ्यता पर किसी दाग से कम नहीं। ऐसे वक्त में, जब हमें अपने नौनिहालों को इस तरह से गढ़ना चाहिए कि आने वाले वर्षों में वे उल्लेखनीय काम करें, हम उन्हें ऐसे कामों में धकेल रहे हैं, जिनका अंजाम सिर्फ और सिर्फ एक है। लिहाजा दुनिया के तमाम मुल्कों को इस वीभत्स कृत्य के खिलाफ एकजुट होना चाहिए और अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए। ऐसा नहीं है कि यह कोई पहली बार होगा, जब पूरी दुनिया बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुटता दिखाएगी।

हमने पहले भी देखा है कि लाइबेरिया में बच्चों को सेना में शामिल किए जाने का विरोध तमाम मुल्कों ने अपने आपसी मतभेद किनारे रखकर एक साथ किया था। वह वक्त एक बार फिर लौट आया है। मासूम बच्चों की जान बचाने के लिए दुनिया के तमाम मुल्कों को वैसी ही प्रतिबद्धता एक बार फिर दिखानी होगी।   
द डेली स्टार, बांग्लादेश

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  • Web Title:recent report by the un childrens fund unicef