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पत्रकारों की मुश्किल

साल 2013 में शी जिनपिंग के सत्ता में आने के बाद चीन में तानाशाही बढ़ने का यह कोई नया आरोप नहीं है। साप्ताहिक लॉब्ज  की बीजिंग संवाददाता व फ्रांसीसी पत्रकार उर्जुला गूचियर को चीन छोड़ने के लिए बाध्य करना उन तमाम विदेशी मीडिया संस्थानों को हतोत्साहित करने वाला कदम है, जो स्वतंत्र व बेबाक खबरें प्रसारित करते हैं। प्रेस वीजा का नवीनीकरण न किए जाने के कारण बीते शुक्रवार को गूचियर को चीन छोड़ना पड़ा। संदेश साफ है कि चीन के आधिकारिक रुख को खारिज करके खबर प्रसारित करने से पहले विदेशी पत्रकारों को सोच लेना चाहिए। गूचियर का कुसूर यह था कि उन्होंने पश्चिम शिनजियांग क्षेत्र में, जहां मुस्लिम, तुर्कीभाषी उईगर अल्पसंख्यकों की आबादी काफी है, चीन की क्रूर आतंकवाद रोधी नीतियों का विश्लेषण करते हुए एक लेख लिखा था। वहां व्यापक पैमाने पर हुए मानवाधिकार उल्लंघन के कारण हाल के वर्षों में सैकड़ों लोग मारे गए हैं। चीन इसे नकारता रहा है। उसका कहना है कि मौत की वजह जेहादी व अलगाववादी कृत्य हैं।

तिब्बत व थ्येन आनमन नरसंहार की तरह ही बीजिंग इस मुद्दे की चर्चा वैश्विक मीडिया में नहीं चाहता। फ्रांसीसी पत्रकार ने बीते नवंबर में लिखा था कि चीन ने उईगर समुदाय के विरुद्ध निर्मम कार्रवाई को जायज ठहराने के लिए पेरिस में हुए हमले का इस्तेमाल किया है। इसके बाद गूचियर को मौत की धमकी मिली, चीन के आधिकारिक मीडिया ने उनकी आलोचना की, विदेश मंत्रालय ने उन पर आतंकवाद को प्रोत्साहित करने का दोष मढ़ा और फिर उनसे सार्वजनिक तौर पर माफी मांगने को कहा, जिसे मानने से उन्होंने मना कर दिया। साफ है, विदेशी पत्रकारों पर अब अधिक दबाव थोपा जाएगा और अगर वे शासन द्वारा मान्य तरीकों से इतर लिखते हैं, तो उन्हें देश छोड़कर भी जाना होगा। लिहाजा उनके लिए लेखन अब और मुश्किल होने वाला है। पश्चिमी हुकूमतों को सार्वजनिक तौर पर ऐसे दबाव की मुखालफत करनी चाहिए; भले ही उनके व्यावसायिक या आर्थिक हित अलग-अलग हों। दुखद यह है कि फ्रांस ने भी इस मसले पर कोई बेहतर उदाहरण पेश नहीं किया।  
द गार्जियन, ब्रिटेन

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  • Web Title:problems of journalists