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आजादी की कीमत

साल 1993 में यूनेस्को ने 'वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे' की नींव रखी थी, जिसे दुनिया भर में इस हफ्ते मनाया गया। फ्रीडम हाउस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2015 में प्रेस की आजादी  पिछले 12 वर्षों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई। दुनिया के करीब 85 फीसदी मुल्कों में प्रेस को मामूली या फिर न के बराबर आजादी हासिल है, जबकि सिर्फ 13 प्रतिशत देशों में उसे बुनियादी आजादी मिली हुई है।

कई सारे मुल्कों में प्रेस पर पाबंदियां बढ़ी हैं, तो वही मिस्र, टर्की और बांग्लादेश में पत्रकारों पर हमले की वारदातें बढ़ी हैं। इस साल के प्रेस फ्रीडम डे का विषय था सूचना तक सबकी पहुंच। सूचनाओं तक पहुंचने में पत्रकारों को विकसित देशों में भी दुश्वारियां उठानी पड़ती हैं, और जापान इसकी एक बड़ी नजीर है, जिसने साल 2013 से ही प्रेस की आजादी की राह में कई तरह की रुकावटें खड़ी कर दी हैं।

पिछले एक दशक से भी अधिक वक्त से पाकिस्तान की शिनाख्त अखबारनवीसों के लिए एक बेहद खतरनाक मुल्क के तौर पर होती रही है। 1992 से अब तक यहां 57 पत्रकार मारे जा चुके हैं। हालांकि अपने फर्ज को अंजाम देते हुए जो पत्रकार इस साल शहीद हुए हैं, उनमें कोई पाकिस्तानी मीडिया वाला शामिल नहीं है, फिर भी इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि पाकिस्तान में उनके लिए हालात बेहतर हो रहे हैं। पाकिस्तानी पत्रकार मुल्क में पसरे तनावों और सत्ता-संघर्ष के शिकार बन रहे हैं। खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान से मिलने वाली रिपोर्टें चिंतित करने वाली हैं।

हुकूमत ने भी पत्रकारों के कत्लेआम व हमलों से जुड़े मामलों में तेजी दिखाने की कोई जरूरत नहीं समझी है। इस साल हैदराबाद और कराची प्रेस क्लबों पर भीड़ ने इसलिए हमले किए कि पत्रकार सिर्फ हुकूमत के ऑर्डर मान रहे हैं और प्राइम टाइम में मुमताज कादरी की सजा से मुतल्लिक खबरें नहीं दिखा रहे। पहले ही तमाम तरह के खतरों से घिरे पत्रकारों के सामने नए साइबर अपराध बिल के रूप में अब एक और चुनौती खड़ी हो गई है, जो डिजिटल सेंसरशिप लागू करती हुई प्रतीत हो रही है। चूंकि पत्रकार खतरनाक स्थितियों में कार्य करते हैं, ऐसे में उनकी हिफाजत को मजबूत करने की जरूरत है।   
द न्यूज, पाकिस्तान

 

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  • Web Title: price of freedom