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सच्चाई नकारती रिपोर्ट

पेरिस की संस्था ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ने प्रेस की आजादी के संदर्भ में 180 देशों की सालाना रैंकिंग जारी की है। दावा है कि मीडिया की आजादी, उसके आत्म-नियंत्रण, निष्पक्षता, दुरुपयोग जैसी कसौटियों पर दुनिया के 180  मुल्कों को कसकर यह रिपोर्ट बनाई गई है। ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ नाम से जारी रिपोर्ट में भूटान को छोड़ नेपाल को बाकी एशियाई देशों के आगे रखा गया है। भूटान को 94वां स्थान मिला है, जबकि नेपाल 105वें पायदान पर है। यह रैंकिंग खुद इस रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है, क्योंकि भूटान में अब भी पूरी तरह से लोकतंत्र नहीं आया है और वहां का प्रेस जीवंत नहीं है। वहां का प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कमोबेश राज्य द्वारा ही नियंत्रित है। ऐसे में, यह सवाल स्वाभाविक है कि या तो यह संस्था किसी पूर्वाग्रह से काम करती है या फिर वह पर्याप्त रिसर्च नहीं करती। इस संस्था की मंशा पर सवाल न भी उठाएं, तब भी नेपाली मीडिया को लेकर इसके तथ्य बेबुनियाद हैं। 1990 में लोकतंत्र-समर्थक आंदोलन की सफलता के बाद नेपाल का मीडिया अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय हुआ है। कई अखबारों, पत्रिकाओं, एफएम स्टेशनों, टेलीविजन केंद्रों व चैनलों की यहां शुरुआत हुई है। बेशक नेपाली मीडिया पर राज्य और विद्रोहियों का उस वक्त विशेष दबाव था, जब माओवादी आंदोलन अपने चरम पर था। मगर यह भी सच है कि राज्य व माओवादियों द्वारा जिन खबरनवीसों की हत्या की गई थी, वे सब के सब अपने पत्रकारीय लेखन की वजह से नहीं मारे गए। इतना ही नहीं, करीब नौ वर्ष पहले हुए राज्य व माओवादियों के बीच व्यापक शांति समझौते के बाद से यहां का मीडिया लगातार सक्रिय रहा है और निर्भीक होकर सबकी खबर ले रहा है। वास्तव में, हुकूमत के खिलाफ आक्रामकता दिखाने वाले या दूसरों की भावना आहत करने वाले मीडिया या पत्रकारों को नेपाल ही नहीं, पूरे एशिया में कहीं भी बख्शा नहीं गया है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स ऐजेंसी बहुत आसानी से इसकी पड़ताल कर सकती है। लिहाजा अपनी रैंकिंग को विश्वसनीय बनाने के लिए इस संस्था को रिसर्च के अपने तरीके दुरुस्त करने चाहिए।  
द हिमालयन टाइम्स, नेपाल

 

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  • Web Title:paris reporters without borders