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उर्दू अदब का बड़ा नुकसान

यह इत्तिफाक ही होगा कि फरवरी महीना अदबी दुनिया के लिए बहुत अच्छा नहीं साबित हो रहा। बीते साल इसी महीने में इंतजार हुसैन और फातिमा सुरय्या बजिया जैसी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर अदबी हस्तियां हमें छोड़ गई थीं। अब इस साल की फरवरी ने भी अदब के लिए एक शून्य पैदा किया है, जब एक और मशहूर साहित्यिक शख्सियत बानो कुदसिया हमारे बीच से चली गईं। यह साहित्यिक-सांस्कृतिक जगत के लिए बड़ा धक्का है। उनका निधन 88 वर्ष की आयु में हुआ है। यह बानो कुदसिया ही थीं, जिन्होंने मानवीय संवेदनाओं, मनोविज्ञान और वैज्ञानिक सोच के समावेश के साथ नए प्रयोग किए और उर्दू अदबी लेखन में एक नई एकल शैली ईजाद की। उनके निधन से अदबी दुनिया को बड़ा नुकसान पहुंचा है। सच तो यह है कि उर्दू अदब और रंगमंच ने यथार्थवादी और उद्देश्यपूर्ण लेखन का एक प्रतिभाशाली रचनाकार खो दिया है। बानो कुदसिया ख्यातिनामा साहित्यिक शख्सियत अशफाक अहमद की बेगम थीं, जिनका इंतकाल सितंबर, 2004 में हो चुका है। बानो कुदसिया का राजा गिद्ध जैसा उपन्यास देश-विदेश में चर्चित हुआ और विश्व उर्दू अदब में यह शुमार किया जाता है। पिया नाम का दीया, दस्त बस्ता, एक दिन, मर्द-ए-अबरेशम, अमरबेल, कुछ और नहीं, फुटपाथ की घास  उनके चर्चित उपन्यास हैं। उनका लेखन तरक्कीपसंद सोच के साथ, नए विचारों के समावेश के लिए भी चर्चित रहा है। उन्होंने पाकिस्तानी टेलीविजन के लिए उर्दू और पंजाबी में तमाम नाटक और धारावाहिक भी लिखे। टेलीविजन नाटकों की दुनिया में उनकी पहचान नई राह दिखाने वाले एक ‘ट्रेंडसेटर’ के रूप में बनी। उन्हें अपने साहसिक, बोल्ड और वैविध्यपूर्ण कथ्य के कारण पाकिस्तान की सरहद से बाहर भी मान्यता मिली और उतना ही पसंद किया गया। उर्दू अदब के प्रचार-प्रसार के लिए बानो कुदसिया का कृतित्व और उनकी सामाजिक सक्रियता का योगदान आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा देगा और याद रखा जाएगा। सच है कि उनके जाने से उर्दू अदब में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है, जिसकी भरपायी आसानी से मुमकिन नहीं।

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  • Web Title:major disadvantage of respect urdu