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1 जून, 2020|3:00|IST

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नेपाल में चुनाव-चर्चा

प्रधानमंत्री दाहाल बार-बार कह रहे हैं कि देश में स्थानीय चुनाव मई या जून तक करा लिए जाएंगे। सत्तारूढ़ दल ने इस सिलसिले में मधेसियों के साथ ही सीपीएन-यूएमएल से बातचीत भी शुरू कर दी है। हालांकि तयशुदा समय पर चुनाव होने को लेकर संशय लगातार कायम है। हकीकत यह है कि देश ऐसे हर बड़े मुद्दे पर संशय में है, जिनका निपटारा चुनावों से पहले हो जाना चाहिए। पहली बात, मधेसी पार्टियां सीमाओं के पुनर्निधारण की मांग पर अड़ी हैं और उन्होंने इस संबंध में संविधान संशोधन होने तक चुनाव-प्रक्रिया में शामिल न होने की चेतावनी भी दे रखी है। उनकी मांगों से सरकार भी सहमत है, लेकिन प्रमुख विपक्षी दल सीपीएन-यूएमएल संविधान संशोधन को अप्रासंगिक बताते हुए पहले चुनाव कराने के पक्ष में है। दूसरी बात, इस बात पर भी अभी एक राय नहीं है कि चुनाव नई व्यवस्थाओं के अनुसार हों या पुरानी व्यवस्था पर। मधेसियों को पुरानी व्यवस्था मंजूर नहीं है। वे इसे यथास्थिति को बढ़ाने वाला और परिवर्तन-विरोधी मानते हैं। जबकि यूएमएल पुराने ढर्रे पर ही चुनाव चाहता है और नेपाली कांग्रेस भी बदलावों के लिए पर्याप्त समय की कमी का हवाला देकर एक तरह से विरोध में ही है। माओइस्ट सेंटर अभी तक अनिर्णय की स्थिति में है। तीसरी बात, स्थानीय निकायों के प्रस्तावित स्वरूप पर लोकल लेवल रिस्ट्रक्चरिंग कमेटी की सिफारिशों पर भी आम सहमति नहीं दिख रही। मधेसी दल तराई क्षेत्र में सौ अतिरिक्त इकाइयां जोड़ने की मांग कर रहे हैं। स्वाभाविक तौर पर यूएमएल, यहां तक कि नेपाली कांग्रेस भी इस मांग के पक्ष में नहीं खड़े होंगे। ये सारे मुद्दे जटिल हैं और इस बात की कोई संभावना नहीं दिखती कि इनका हल निकट भविष्य में निकल पाएगा। ऐसे हालात में यह सोचना होगा कि क्या सारे महत्वपूर्ण मसलों का हल निकाले बिना शांतिपूर्ण निष्पक्ष चुनाव संभव हो पाएंगे? हम पहले भी आगाह करते रहे हैं कि ऐसा कोई थोपा हुआ प्रयास देश को सांविधानिक संकट में धकेलने वाला साबित हो सकता है। सवाल यह भी है कि क्या सभी पक्ष स्थिति की गंभीरता को भांप रहे हैं। यदि नहीं, तो उन्हें इन पर गंभीरता से सोचना होगा।