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सवाल नागरिकता का

संसद की सभामुख (सभाध्यक्ष) ओंसारी घारती मागर ने बीते रविवार को इस पर दुख जाहिर किया कि हमारे देश का कानून माओं को यह अधिकार निर्विवाद रूप से नहीं देता कि वे अपने बच्चों को अपने देश की नागरिकता हस्तांतरित कर सकें। उन्होंने कहा कि नए कानून में समान नागरिकता के अधिकार पर पर्याप्त गौर किया गया है।

घारती सौ फीसद सही नहीं हैं। संविधान का अनुच्छेद 11.2 (बी) कहता है कि 'यदि जन्म के समय बच्चे की मां या पिता के पास नेपाल की नागरिकता है, तो वह नेपाली नागरिकता का हकदार है'। मगर बाद का एक प्रावधान समान नागरिकता के पहले के प्रावधान को अप्रभावी बना देता है। अनुच्छेद 11.7 के अनुसार, 'जन्म के समय यदि मां नेपाल की नागरिक है और उसने विदेशी नागरिक से शादी कर रखी है, तो संघीय कानून के अनुसार उसे तभी स्वाभाविक नागरिकता मिल सकती है, जब वह नेपाल में स्थायी तौर पर रहे और उसके पास किसी अन्य मुल्क की नागरिकता न हो।

आनुवंशिक तौर पर नागरिकता तभी दी जा सकती है, जब संबंधित व्यक्ति के माता और पिता, दोनों नेपाल के नागरिक हों और उस व्यक्ति का जन्म भी नेपाल में हुआ हो।' स्पष्ट है कि मौजूदा सांविधानिक प्रावधान तलाकशुदा महिलाओं के लिए मुश्किलें खड़ी करता है। इसमें नेपाली मां के लिए यह अनिवार्य है कि या तो वह अपने पति की पहचान करे या फिर साबित करे कि बच्चे का पिता अज्ञात है। नया संविधान नेपाली महिला के विदेशी पति के लिए भी नागरिकता लेना मुश्किल बनाता है। पहले 15 साल देश में रहने पर नेपाली महिला से शादी करने वाले विदेशी मर्द को स्वाभाविक नागरिकता मिल जाती थी, जबकि नया संविधान इसके बारे में मौन है।

वहीं, नेपाली पुरुष से शादी करने वाली विदेशी महिला को शादी के तुरंत बाद नागरिकता मिल सकती है। लिहाजा सभामुख के तर्क आधारहीन हैं। मुद्दा राजनीति व नौकरशाही व्यवस्था में मौजूद पुरुष वर्चस्ववादी मानसिकता है। दुर्भाग्य से घातरी और राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने खुद को पितृसत्तात्मक राजनीतिक ढांचे तक सीमित रखा है, जबकि यह वक्त महिला नेताओं को दिशा दिखाने का है।   
काठमांडू पोस्ट, नेपाल

 

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