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कानून के राज की जीत

एक इंसान जितना बर्बर हो सकता है, एंडर्स ब्राइविक उस हद तक क्रूर है। साल 2011 में इस दक्षिणपंथी आतंकी ने बमबारी व गोलीबारी करके नॉर्वे में 77 बेगुनाहों को मौत की नींद सुला दिया था। उसके खिलाफ चल रहे मुकदमे का फैसला पहले ही आ चुका है और नॉर्वे के कानून के मुताबिक उसे कठोरतम सजा, यानी 21 साल की कैद सुनाई गई।

यही नहीं, अदालत ने अपने फैसले में यह शर्त भी जोड़ रखी है कि सजा पूरी करने के बाद भी यदि ब्राइविक को जनता के लिए खतरनाक समझा गया, तो यह सजा बढ़ाई जा सकती है। बाद के घटनाक्रम में यह दुष्ट व्यक्ति फरियादी बन गया। इसका आरोप था कि कैद में उसे तन्हा रखने से उसके मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। और वह अपना मुकदमा भी जीत गया है। हालांकि यह हैरत में डालने वाली बात लग सकती है, मगर एक बार फिर कानून के राज की ही जीत हुई। जज हेलेन ए सेकुविच ने बुधवार को अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि ब्राइविक का एकांत कारावास 'अमानवीय' था। अदालत ने सरकार को आदेश दिया कि वह इस सजायाप्ता के एकाकीपन को कम करे और उसकी कानूनी फीस भी चुकाए।

अनेक अमेरिकियों को यह पच नहीं रहा कि एक हत्यारे को अलग-थलग करने की सजा इतनी जघन्य मानी जाए, खासकर सुविधाओं से लैस नार्वे जेल के बंदी के लिए। नॉर्वे के उन लोगों को भी यह घटिया फैसला लग रहा है, जो समाज की मुख्यधारा में कैदियों की वापसी कराने से जुड़े हुए हैं। लेकिन जज सेकुविच सही हैं।

वास्तव में, ब्राइविक ने मानवाधिकारों की बुनियादी अवधारणाओं को अदालत में उठाया और कानून के राज को उसके सबसे कठिन परीक्षा में डाल दिया, जो व्यक्ति यह मानता है कि वह कानून व इंसानियत से परे है, जो असहाय किशोरों के कत्ल करता यहां-वहां भाग सकता है, क्या उन लोगों के समान मानवाधिकारों का हकदार है, जिनके अधिकारों को उसने यूं नकार दिया? निस्संदेह, इसका जवाब 'हां' होना चाहिए, क्योंकि इन अधिकारों का बंटवारा किसी के आचरण या नैतिक रुख के आधार पर नहीं हुआ है। ये सार्वभौमिक हैं और होने भी चाहिए।
द न्यूयॉर्क टाइम्स, अमेरिका

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  • Web Title:brutal as anders breivik