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कथक की चपलता, बंसी की तान के बीच सधे स्वर

कथक की चपलता, बंसी की तान के बीच सधे स्वर

भैंसासुर घाट पर तीन दिवसीय सांगीतिक उत्सव वाराणसी की विरासत का समापन शुक्रवार को हुआ। पद्मश्री डॉ. सोमा घोष ने स्वर से तट को सजाया तो पं. प्रवीण ने विशेष बांसुरी पर तान छेड़ आनंदित किया। वहीं नलिनी व कमलिनी ने कथक की मोहकता का एहसास कराया।

एडवाइजरी बॉडी फार इंटैंजिबल कल्चरल हेरिटेज, यूनेस्को तथा संगीत नाटक अकादमी व नगर निगम की ओर से तीन दिवसीय उत्सव की अंतिम निशा की पहली प्रस्तुति भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां मानसपुत्री पद्मश्री डॉ. सोमा घोष ने गणपति, गंगा व शिव वंदना से स्वर साधना का आरंभ किया। इसके बाद राग मिश्र खमाज में दादरा के बोल लागी नजरिया, ना मानूंगी.. से माहौल के अनुरूप स्वर को सजाये। फिर, ब्रज की होरी को शब्दों से संवारा तो चैती के बोल एही ठईयां मोतिया हेराईल हो रामा... से बनारसी मौशकी का आनंद बरसाया।

फिर मंच पर बांसुरी का रस घोलने विशिष्ट साधक पं. प्रवीण गोडखिंडी पहुंचे। आठ फुट की बांसुरी पर सरगम की तान छेड़ी। राग यमन में अलाप, जोड़ के साथ धुन को संवारा। पं.प्रवीण ने अर्जेटीना में वर्ल्ड म्यूजिक में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा चुके हैं। प्रस्तुति में रियाज की मौज घोली।

अंतिम प्रस्तुति में प्रसिद्ध कथक साधिका नलिनी व कमलिनी ने थाप और सामंजस्य से लोगों को आनंदित किया। शिव वंदना से शुरुआत की। इसके बाद मनोहरी पग संचालन और भाव-भंगिमा से सभी को लुभाया। पारम्परिक कथक के साथ ही सृजनशीलता का पक्ष भी इनके नृत्य में झलका। गायन में पं. जितेन्द्र ने साथ दिया। कलाकारों को नगर आयुक्त हरी प्रसाद शाही ने सम्मानित किया। संचालन सुमन पाठक ने तथा धन्यवाद ज्ञापन आलोक पारिख ने किया।

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