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दरोगा के हमलावरों की सरगर्मी से तलाश, छापेमारी

निबोहरा के गांव शाहवेद के मजरा गढ़ी हीरालाल में दबिश के दौरान दरोगा को गोली मारने वालों की सरगर्मी से तलाश की जा रही है। दो हमलावरों को पकड़ लिया गया है। पूरी रात गांव पुलिस छावनी बना रहा। एक-एक घर में पुलिस ने दबिश दी। दरवाजे उखाड़ फेंके। पुरुष फरार हो गए थे। गंभीर धाराओं में मुकदमा लिखा गया है। 19 नामजद हैं। 35 अज्ञात हमलावरों का भी मुकदमे में जिक्र है। आधा दर्जन प्रमुख आरोपियों पर इनाम घोषित किया गया है।      

वारंटी विनोद सिंह को पकड़ने के लिए निबोहरा पुलिस ने दबिश दी थी। एसआई सुधीर कुमार के साथ सिपाही बलवीर सिंह, मोहरपाल, भरत सिंह, राजपाल, कंबोद सिंह थाने की जीप से गांव में पहुंचे थे। विनोद घर पर ही मिल गया था। उसे पकड़ते ही महिलाओं ने बदमाश-बदमाश हल्ला मचा दिया था। उसके बाद लाठी-डंडों से पुलिस पर हमला बोल दिया था। पुरुषों ने छतों से फायरिंग और पथराव किया था। एक गोली दरोगा सुधीर सिंह के सीने पर लगी थी। बलवीर सिंह का सिर फूट गया था। अन्य पुलिस कर्मी भाग गए थे। घटना की जानकारी होते ही डीआईजी लक्ष्मी सिंह, एसएसपी राजेश डी मोदक, एसपी देहात पूर्वी केपी यादव फोर्स के साथ गांव में पहुंच गए थे।

पूरी रात अधिकारियों का गांव में डेरा रहा। आखिर हमला क्यों बोला गया। अधिकारियों ने पहले इसकी जांच कराई। छानबीन में पता चला कि विनोद अपराधी प्रवृत्ति का है। उसका पड़ोसी बिजेंद्र हिस्ट्रीशीटर है। हल्ला मचने पर छतों पर नशे में धुत होकर बैठे पुरुषों ने फायरिंग और पथराव शुरू कर दिया था।

पूरी रात हमलावरों की तलाश में ताबड़तोड़ दबिश दी गई। पुलिस ने खेत तक खंगाल मारे। हमलावरों को चि?ित किया गया। उसके बाद थानाध्यक्ष सुजात हुसैन की तहरीर पर बलवा, जानलेवा हमला, पथराव, मारपीट, सरकारी कार्य में बाधा, सात क्रिमनल लॉ अमिंडमेंट एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। मुकदमे में महिलाएं भी नामजद हैं। एसएसपी ने बताया कि  विनोद, बुंदा, कैलाशी, भूरे सिंह, बिजेंद्र, रामजोत, डोरीलाल, बबली, वर्षा, रामलाल, रामकेश, हरीशचंद्र, महावीर, उपेंद्र, भगवान, सत्यप्रकाश आदि नामजद हैं। प्रमुख छह हमलावरों के खिलाफ पांच-पांच हजार रुपये का इनाम घोषित किया गया है।

सिपाहियों ने साहसी दरोगा को दिखाई पीठ
आगरा। प्रमुख संवाददाता। निबोहरा थाने में तैनात दरोगा सुधीर कुमार की सांसें उसके साहस से ही चल रही हैं। सिपाहियों ने तो गोलियां चलते ही उसे पीठ दिखा दी थी। जीप लेकर भाग गए थे। सीने पर गोली खाने के बाद पहले उसने अपनी पिस्टल निकाली थी। उसे लोड करके फायर का प्रयास भी किया था। खून बह रहा था। वह खुद ही पैदल गांव से सड़क तक आया था। तब कहीं उसे इलाज के लिए ले जाया जा सका था। साहस के चलते किस्मत ने भी उसका साथ दिया। गोली छत से चली थी। इसलिए सीने पर लगने के बाद नीचे की तरफ गई। सीधी होती तो कुछ भी हो सकता था।

निबोहरा के गांव शाहवेद में साहसी दरोगा के साथ पांच सिपाही गए थे। सभी के पास थ्री नॉट थ्री की राइफल थी, लेकिन किसी ने मुकाबला नहीं किया। एसएसपी राजेश डी मोदक जब घटना स्थल पर जांच करने पहुंचे तो उन्हें जानकारी हुई कि दरोगा को जाते ही गोली लग गई थी। सिपाही बलवीर को महिलाओं ने पीट-पीटकर जख्मी कर दिया था। सिपाही मोहरपाल खेत में छिप गया था। अन्य तीन सिपाही भरत सिंह, राजपाल व कंबोद थाने की जीप लेकर वापस भाग आए थे। पुलिस के पैर उखड़ गए थे इसलिए हमलावर हावी होते चले गए। एसएसपी ने सिपाहियों की इस कायरता को गंभीरता से लिया है। पूरे प्रकरण में सिपाहियों की कार्यप्रणाली की जांच कराई जा रही है।

एसएसपी का कहना है कि पुलिस पूरी तैयारी से गई थी। एक दरोगा और छह सिपाही गए थे। सभी के पास हथियार थे। इसके बावजूद एक दरोगा जख्मी हो गया। सिपाहियों को गोली चलाने से किसने रोका था। दूसरी तरफ से फायरिंग होते ही सिपाहियों को भी गोलियां चलानी चाहिए थी। पुलिस जांच में साफ हुआ कि ग्रामीणों की तरफ से लगभग एक दर्जन फायर हुए थे। सभी गोलियां तमंचों से चलाई गई थीं। दरोगा को .315 बोर की गोली लगी थी। उसकी किस्मत अच्छी थी जो गोली सामने से नहीं मारी गई थी। कुछ भी हो सकता था। गोली दिल के बहुत करीब लगी थी। चूंकि गोली छत से चलाई गई थी इसलिए उसकी दिशा नीचे की तरफ थी। गोली सीने में लगने के बाद नीचे की तरफ चली गई थी। गोली अभी फंसी हुई है। डॉक्टर तय नहीं कर पा रहे हैं कि ऑपरेशन करके इसे निकालना ठीक है अथवा नहीं। कुछ डॉक्टरों का कहना है कि गोली निकालने के लिए ऑपरेशन करने की जरूरत नहीं है। उससे दिक्कत होगी तो ऑपरेशन करेंगे।

डीआईजी-एसएसपी ने भरी जान
वारदात से निबोहरा पुलिस घबरा गई थी। जिस गांव में वारदात हुई थी वह राजस्थान बार्डर से महज एक किलोमीटर की दूरी पर है। थाने से गांव की दूरी महज पांच सौ मीटर है। डीआईजी लक्ष्मी सिंह और एसएसपी राजेश डी मोदक ने मौके पर पहुंचकर फोर्स में जान फूंकी। सिपाहियों से कहा कि उन्हें डरने की जरूरत नहीं है। उन्हें यह हथियार इसलिए दिए गए हैं कि बदमाशों पर वार करें।

कोई बदमाश उन पर गोली चलाए तो उन्हें शांत रहने की जरूरत नहीं है। जिसने भी दरोगा पर हमला किया है उसके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी। सभी दबिश में जुट जाएं। छापेमारी के दौरान यह ध्यान रहे कि कोई भी महिलाओं और बच्चों से अभद्रता नहीं करेगा। जो लोग वारदात में शामिल हैं सिर्फ उन्हें ही पकड़ा जाएगा। नाम साफ नहीं है तो पहले यह पता लगा लिया जाए कि बवाल करने वाले कौन-कौन लोग थे। पुलिस ने ऐसा ही किया।

पुलिस की कार्रवाई पर नजर रखने के लिए डीआईजी और एसएसपी अल सुबह तक गांव में ही जमे रहे। एसएसपी राजेश डी मोदक ने बताया कि उनकी पहली प्राथमिकता अपने दरोगा की जान बचाना था। वह सीधे इमरजेंसी पहुंचे थे। दरोगा की हालत खतरे से बाहर है डॉक्टरों के यह बताने के बाद उनकी जान में जान आई थी। वह सीधे गांव की तरफ भागे थे। हमलावरों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई की जाएगी जिसे दूसरे लोग भी याद रखेंगे। ताकि कोई भविष्य में पुलिस पर हमला नहीं करे।

हिस्ट्रीशीटर ने कराया पूरा बवाल
गांव शाहवेद निवासी बिजेंद्र हिस्ट्रीशीटर है। मथुरा पुलिस ने पूर्व में उसे डकैती में जेल भेजा था। उसने गांव में आलीशान मकान बना रखा है। पुलिस गांव में जब भी आती है उसके परिवारीजन जरूर विरोध करते हैं। मकान की छत पर ईंट-पत्थर जमा करके रखते हैं। ताकि पुलिस के आते ही हमला बोल सकें।

विनोद के घर जब पुलिस ने दबिश दी तो सबसे पहले महिलाओं ने हंगामा शुरू किया था। विनोद के पिता ने भी शोर मचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। इसके बाद बिजेंद्र ने मोर्चा संभाल लिया था। उसने तीस-चालीस लोगों के साथ मिलकर पुलिस पर निशाना साधा था। स्ट्रेट फायरिंग की थी। गोलियां चलते ही पुलिस के पैर उखड़ गए थे। बिजेंद्र निबोहरा थाने का हिस्ट्रीशीटर है। मार्च 2015 में मथुरा पुलिस ने उसे डकैती में जेल भेजा था। वह जमानत पर रिहा हुआ है।

पहले भी गांव में पिटी है पुलिस
करीब चार हजार की आबादी वाले इस गांव के कई मजरे हैं। यह पहला मामला नहीं है जब पुलिस टीम पर हमला हुआ है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहली बार किसी दरोगा को गोली लगी है। पुलिस तो पहले भी कई बार यहां पिट चुकी है। एक बार गांव में थाना मंसुखपुरा के दरोगा ने गांव में दबिश दी थी। ग्रामीणों ने दरोगा को बंधक बना लिया था। उसे पीट-पीटकर अधमरा करके फेंक दिया था। इसी साल होली के दिन बालू का ट्रैक्टर पकड़े जाने पर शाहवेद के ग्रामीणों ने काडर (राजस्थान) के ग्रामीणों के साथ मिलकर पुलिस को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा था। पुलिस ने इस मामले को दबा दिया था। कोई कार्रवाई नहीं होने पर ग्रामीणों के हौसले बुलंद हो गए थे।

पुलिस पर तोड़फोड़ का आरोप, दहशत
शाहवेद के मजरा गढ़ी हीरालाल में दरोगा को गोली मारने की घटना के बाद पुलिस का गुस्सा ग्रामीणों पर फूट रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि पुलिस ने गुस्से में जो मिला उसे बेरहमी से पीटा। मकानों में तोड़फोड़ की गई। पुलिस के तांडव से गांव खाली हो गया है। महिलाएं और बच्चे दहशत में हैं। मोहन सिंह, चोब सिंह, कैलाशी पुत्र पतोले, विजेन्द्र पुत्र मवाशी, भंवर सिंह पुत्र रघुवर दयाल, पंचम सिंह आदि के परिवारीजन तोड़फोड़ का आरोप लगा रहे हैं। मोहन सिंह का कहना है कि पुलिस ने आते ही भतीजे की बहू के साथ छेड़छाड़ की थी। तब उन्होंने हमला बोला।

बिजेन्द्र की पत्नी ने आरोप लगाया था कि परिवार घर में सो रहा था। रात में पुलिस ने घर में हमला कर दिया। थानाध्यक्ष सुजात हुसैन ने बताया कि दरोगा को गोली मारने के बाद हमलावर अपने बचाव के लिए कहानी बना रहे हैं। पुलिस ने किसी के घर में तोड़फोड़ नहीं की है। किसी के साथ कोई मारपीट नहीं की गई है। मुकदमा लिखा गया है। जो नामजद हैं उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेजा जाएगा। दरोगा अस्पताल में जिंदगी और मौत से लड़ रहा है। उसे ग्रामीणों की गोली लगी है। गोली किसने चलाई थी यह भी पता चल चुका है। जिन छतों से फायरिंग हुई थी वहां खाली खोखे मिले हैं।

चाकू में पकड़ा गया था विनोद
गांव शाहवेद के मजरा गढ़ी हीरालाल का विनोद वर्ष 2007 में 23 दिसंबर को चाकू सहित रकाबगंज थाने में पकड़ा गया था। उसके खिलाफ दरोगा फूल सिंह ने कार्रवाई की थी। यह मुकदमा कोर्ट में चल रहा है। इसी मुकदमे में आरोपित का गैर जमानती वारंट जारी हुआ था। निबोहरा पुलिस उसे पकड़ने गई थी। वह पेशेवर बदमाश नहीं है। इसलिए एक दरोगा और छह सिपाही गांव में गए थे। पुलिस को उम्मीद नहीं थी कि गांव में हमला हो जाएगा। पुलिस जीप सायरन बजाते हुए विनोद के घर तक पहुंची थी। वह छत पर था। पुलिस ने उसे पकड़ लिया था। ऊपर से लाते समय महिलाओं ने सिपाही बलवीर के सिंह पर डंडा मार दिया था। दरोगा को गोली मारी थी। इसके बाद सिपाही भाग खड़े हुए थे।

कम होता जा रहा है खाकी का इकबाल
आगरा। प्रमुख संवाददाता। खाकी का इकबाल कम होता जा रहा है। पहले गांव में एक सिपाही जाकर किसी को भी पकड़ लाता था। बदमाश पुलिस को देखकर अपना रास्ता बदल लेते थे। थाने में बदमाश घुसने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाते थे। पुलिस की जीप सायरन बजाते हुए निकलती थी तो सड़क खाली हो जाती थी। अब ऐसा नहीं है। आखिर क्यों। यह जानने के लिए सोमवार को शहर के कई थाना प्रभारियों से बातचीत की गई। सभी ने एक ही बात कही कि पुलिस अब सिर्फ नौकरी कर रही है। जांच झेलने की हिम्मत उसमें नहीं है।

पहले सिपाही को गोली मारकर भोला फरार हुआ। इस घटना के चार दिन बाद निबोहरा के गांव शाहवेद में पुलिस पार्टी पर हमला हुआ। एक दरोगा को गोली मार दी गई। आखिर यह हो क्या रहा है। पुलिस कमजोर क्यों पड़ती जा रही है। शहर के एक थानेदार का कहना था कि किसी को भी पकड़ते ही सिफारिशी फोन पहले आ जाते हैं। नेता पैरवी करने लगते हैं। अधिकारियों पर दबाव बनाया जाता है। बदमाश बड़े आराम से छूट जाते हैं। सिपाहियों को राइफल जरूर दी जाती है मगर उन्हें चलाने के लिए अधिकार नहीं दिया जाता है। सिपाही जरूरत पड़ने पर गोली चला दे तो उसके खिलाफ ही जांच शुरू हो जाती है।
 
बदमाश मानवाधिकार आयोग का खुलकर फायदा उठा रहे हैं। किसी भी बदमाश के साथ पुलिस अब मारपीट नहीं करती है। पकड़ने के बाद उससे साधारण तरीके से पूछा जाता है। चौबीस घंटे से पहले उसे जेल भेजना पड़ता है। जो भी नियम तोड़ता है उसके खिलाफ जांच शुरू हो जाती है। वरिष्ठ अधिकारी ही साथ नहीं देते हैं। मामूली दबाव पड़ने पर तत्काल निलंबित कर देते हैं। मीडिया को सिर्फ पुलिस की कमियां नजर आती हैं। एक चांटा मारने पर निलंबन हो जाता है। यह सब कुछ देखते हुए पुलिस अब मैनेजर बन गई है। हर पुलिस वाला सिर्फ नौकरी कर रहा है। चाहता है कि उसे किसी पर हाथ ही नहीं उठाना पड़े।

कानून सख्त है। मुकदमा लिख जाता है मगर सजा में बहुत लंबा समय लग जाता है। पुलिस ही कोर्ट में पुराने मामलों की ठोस पैरवी नहीं करती है। जिस थाना प्रभारी के समय का केस होता है केस के ट्राइल के समय वह जिले में नहीं होता है। बाहर से गवाही पर आता है। एनकाउंटर बंद हो गए हैं। कितना भी बड़ा बदमाश क्यों नहीं हो पुलिस उस पर गोली नहीं चलाती है। पुलिस को जेल जाने का डर सताने लगा है। पुलिस चाहती है कि उसे कैसे भी पकड़ लिया जाए। चाहे इसके लिए हाथ-पैर ही क्यों नहीं जोड़ने पड़े।

एक थाना प्रभारी का कहना था कि पहले के पुलिस का इमान हुआ करता था। कोई भी उसे पैसा देने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था। अब स्थिति यह है कि ऑटो रोको तो वे भी पैसा देकर पुलिस से पिंड छुड़ाने का प्रयास करता है। यही बात बदमाशों के जेहन में बैठ गई है। उन्हें लगता है चाहे जो अपराध कर लो। पुलिस कुछ नहीं कर पाएगी। बाद में पैसे देकर सेटिंग से गिरफ्तार हो जाएंगे। जेल जाएंगे। कुछ दिनों बाद जमानत हो जाएगी। दहशत के चलते कोई गवाही देने नहीं आएगा। ऐसा ही वर्तमान में हो रहा है। पुलिस भले लोगों के साथ उठ बैठ नहीं रही है। बदमाशों की मित्रता पुलिस वालों से हो गई है। वे उनके साथ उठते-बैठते हैं। खाते-पीने लगे हैं। इसलिए पुलिस का खौफ खत्म होता जा रहा है।

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