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सुचेता कृपलानी जैसी महिलाओं की हमदर्द अब कहां

भारत छोड़ो आंदोलन में लडकियों को ड्रिल और लाठी चलाना सिखाया। नोआखली के दंगा पीडित इलाकों में गांधी जी के साथ चलते हुए पीडित महिलाओं की मदद की। 15 अगस्त 1947 को संविधान सभा में वन्देमातरम् गाया। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के रूप में राज्य कर्मचारियों की हड़ताल को मजबूत इच्छाशक्ति के साथ वापस लेने पर मजबूर किया। पहले साम्यवाद से प्रभावित हुईं और फिर पूरी तरह गांधीवादी हो गईं। प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी की जिंदगी के ये पहलू उन्हें ऐसी महिला की पहचान देते हैं, जिसमें अपनत्व और जुझारूपन कूट-कूट कर भरा था। एक शख्सीयत कई रूप- आज इतने गुणों वाले राजनेता शायद ही मिलें। लखनऊ के मशहूर बुक सेलर राम आडवाणी उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, ‘सुचेता जी में फैसले लेने की क्षमता गजब की थी। मन की पक्की थीं और उनकी खासियत थी साफ-सुथरा सुलझापन।’ शायद उनकी यही खूबी गांधीजी को भी भा गई और उन्होंने 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह के लिए उनका नाम चुना।

भारत छोड़ो आंदोलन में जब सारे पुरुष नेता जेल चले गए तो सुचेता कृपलानी ने अलग रास्ते पर चलने का फैसला किया। ‘बाकियों की तरह मैं भी जेल चली गई तो आंदोलन को आगे कौन बढ़ाएगा।’ वह भूमिगत हो गईं। उस दौरान उन्होंने कांग्रेस का महिला विभाग बनाया और पुलिस से छुपते-छुपाते दो साल तक आंदोलन भी चलाया। इसके लिए अंडरग्राउण्ड वालंटियर फोर्स बनाई। लड़कियों को ड्रिल, लाठी चलाना, प्राथमिक चिकित्सा और संकट में घिर जाने पर आत्मरक्षा के लिए हथियार चलाने की ट्रेनिंग भी दी। राजनीतिक कैदियों के परिवार को राहत देने का जिम्मा भी उठाती रहीं।

दंगों के समय महिलाओं को राहत पहुंचाने, चीन हमले के बाद भारत आए तिब्बती शरणार्थियों के पुनर्वास या फिर किसी से भी मिलने पर उसका दुख-दर्द पूछकर उसका हल तलाशने की कोशिश हमेशा रहती।

मुख्यमंत्री बनने के बाद एक वाकिया याद करते हुए राम आडवाणी कहते हैं, ‘लखनऊ के हैवलक रोड पर रहने वाले सीडीआरआई के वैज्ञानिक डॉ. चित्तू रे की पत्नी की उन्हीं के नौकर ने हत्या कर दी थी। सुचेता कृपलानी को पता चला। कहा- अब उस घर में डॉ. चित्तू कैसे रह पाएंगे? उन्होंने डॉ. चित्तू को रीवर बैंक कालोनी में घर एलॉट कर दिया।’ चीन के खिलाफ युद्ध में उन्होंने लखनऊ के लोगों से मदद की अपील में अपनी साड़ी का आंचल फैला दिया। लोगों ने भी निराश नहीं किया। देखते ही देखते आंचल गहनों से भर गया।

सुचेता कृपलानी को दिखावे और तामझाम पसंद नहीं था। मेंहदावल के बुजुर्ग कांग्रेसी देवेंद्र सिंह बताते हैं कि विधानसभा चुनाव के दौरान उनके जनसम्पर्क का काफिला पैदल ही निकलता था। एक दिन में वह आठ से 10 गांवों में जाती थीं और इस दौरान कोशिश करतीं कि हर आदमी से मिलें। जनसम्पर्क के दौरान वह महिलाओं से मिलकर उनका हालचाल जरूर पूछतीं। उन्हें इस बात की हिदायत भी देतीं कि अपनी बच्चियों को स्कूल जरूर भेजें। मेंहदावल कस्बे के रामदुलारे यादव और बद्री सेठ का घर ही उनका चुनाव कार्यालय था।

आज जब नेता चुनावों में भी पूरा वक्त क्षेत्र को नहीं देते, सुचेता चुनाव जीतकर भी अपने क्षेत्र में वक्त बितातीं। मेंहदावल कस्बे के मौलाना इदरीस बताते हैं कि विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भी उनका ज्यादातर समय मेंहदावल में ही बीतता था। मुख्यमंत्री हो गईं तो समय की व्यस्तता के कारण दो तीन महीने में एक बार आती थीं लेकिन कोशिश करती थीं कि अधिक से अधिक लोगों से मिलें, बात करें और उनकी दिक्कतों को दूर करें। वह अपने विधानसभा क्षेत्र के भूगोल से अच्छी तरह परिचित थीं। जब कोई उनसे मिलने लखनऊ पहुंचता था तो बाढ़ प्रभावित कछार क्षेत्र की समस्याओं पर उससे चर्चा जरूर करती थीं।

बुजुर्ग कांग्रेसी गोपाल जी मिश्र बताते हैं कि अगर कोई उनसे मिलने लखनऊ चला जाता और कहता कि वह मेंहदावल से आया है तो जरूरी मीटिंग में होने के बावजूद उसे समय देती थीं और जिसका भी नाम याद रहता, उसका हालचाल पूछती थीं। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें कुछ लोगों ने बताया कि राप्ती नदी पर पुल की दिक्कत के कारण आने-जाने में समस्या होती है तो उन्होंने सांडे़कला पर लकड़ी का पुल बनवाया।

मौलाना इदरीस बताते हैं कि सुचेता कृपलानी समस्याओं को टालने के बजाय तुरंत निपटाने पर जोर देती थीं। एक बार मेंहदावल आईं तो नगर वाली माता मंदिर तक जाने वाला रास्ता टूटा हुआ मिला। यह देख काफी नाराज हुईं। उनके निर्देश पर आनन-फानन में खड़ंजा बिछाया गया। उनके मुख्यमंत्री रहने के दौरान ही राज्य कर्मचारियों की पहली हड़ताल हुई जो 62 दिनों तक चली थी। यह हड़ताल उनकी दृढम्ता और फैसला लेने के जज्म्बे की मिसाल बनी। उन्होंने खुद न झुकते हुए हड़ताल करने वालों को उसे वापस लेने पर विवश कर दिया।

जन्म: 25 जून 1908 को अंबाला में
मृत्यु: 1 दिसम्बर 1974
विवाह: 1936
में गांधीवादी नेता आचार्य जेबी कृपलानी से
शिक्षा: बीए, पंजाब विवि, एमए दिल्ली विवि
अध्यापन: बीएचयू में इतिहास की प्राध्यापिका

राजनीतिक सफर

1939 में नौकरी छोड़कर राजनीति में आईं
1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह किया और गिरफ्तार
1941-42 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महिला विभाग और विदेश विभाग की मंत्री
1942 से 44 तक निरन्तर निरन्तर सफल भूमिगत आंदोलन चलाया फिर 1944 में गिरफ्तार किया गया
1946 में केन्द्रीय विधानसभा की सदस्य
1946 में संविधान सभा की सदस्य और फिर इसकी प्रारूप समिति की सदस्य बनीं
1948-51 तक कांग्रेस कार्यकारिणी की सदस्य
1948 में पहली बार विधानसभा के लिए चुनी गईं।
1950 से लेकर 1952 तक प्रॉविजनल लोकसभा की सदस्य रहीं।
1949 में संयुक्त राष्ट्रसंघ महासभा अधिवेशन में भारतीय प्रतिनिधि मंडल की सदस्य के रूप में गईं
1952 और 1957 में  नई दिल्ली से लोकसभा के लिए निर्वाचित। इस दौरान लघु उद्योग मंत्रालय में राज्य मंत्री रहीं।
1962-67 तक मेंहदावल से उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए निर्वाचित
अक्तूबर 1963 से मार्च 1967 तक उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री
1967 में गोण्डा से लोकसभा के लिए चुनी गईं

अन्य उपलब्धियां
अनेक ट्रेड यूनियनों की अध्यक्ष तथा इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस की दिल्ली शाखा की चेयरमैन। कस्तूरबा गांधी ट्रस्ट की संगठन मंत्री और गांधी स्मारक निधि की उपाध्यक्ष भी रहीं। दिल्ली विश्वविद्यालय की सीनेट की सदस्य भी रहीं। नव हिंद एजुकेशनल सोसायटी की अध्यक्ष की हैसियत से उन्होंने लड़कियों का एक स्कूल भी चलाया।

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