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20 अप्रैल, 2021|3:43|IST

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इन भूमिपुत्रों का दर्द कोई नहीं सुनता

इन भूमिपुत्रों का दर्द कोई नहीं सुनता

सोमवार के अंक में आपने पढ़ा कि किस तरह समाजवाद और समाजवादियों ने इस इलाके में अपनी रंगत बदली। आज किसानों की व्यथा-कथा को उकेरता यह समाचार फीचर- 

किसानों की पीड़ा पर लंबे-लंबे भाषण दिए जाते हैं पर उनके हालात को सुधारने की सार्थक पहल कोई नहीं करता। जनप्रतिनिधि इस इलाके में भी जीतने के बाद कम शक्ल दिखाते हैं। पार्टी कोई भी हो, वह सिर्फ घोषणाएं करती है। कामकाज का हिसाब देने में किसी की रुचि नहीं है।

यह है मेरी चुनाव यात्रा के दूसरे चरण का निचोड़। 

सफर की शुरुआत में पास से गुजरते एक किसान से पूछता हूं कि क्या हाल है? वह अपनी तकलीफ बयान करता है कि इस बार आलू दो से ढाई रुपये किलो बिका। हमारी तो सारी मेहनत बेकार चली गई। दूसरे से पूछता हूं कि आलू की सही कीमत मिल जाती, तो आपका कितना फायदा होता? उसने कहा कि अगर सही कीमत मिल भी जाती, तो कोई बहुत ज्यादा लाभ नहीं होता। जरूरत तो इस बात की है कि इस इलाके में आलू से जुड़े उद्योग लगाए जाएं। हमें निर्यात करने लायक फसल उगाने के साधन मुहैया कराए जाएं।
 
नौजवान ठीक कह रहा था। कानपुर और फर्रुखाबाद के अलावा आलू की मंडी कहीं नहीं है। कन्नौज में ‘पेप्सी’ ने चिप्स की फैक्टरी लगाई थी, जो बंद हो गई। इस पूरे इलाके में 1.25 लाख हेक्टेयर भूमि पर आलू होता है। संसार के हर खाद्य पदार्थ में इसे ‘राजा’ का दर्जा प्राप्त है पर सब्जियों के इस बादशाह को सरसब्ज करने वाले किसान कंगाल हो रहे हैं।


 यही हाल धान और गन्ने की फसल का है। घाटमपुर में इस इलाके की एकमात्र चीनी मिल थी, जो 2008 में बंद हो गई। नतीजतन, दस लाख कुंतल गन्ना उगाने वाला यह क्षेत्र मुश्किल से एक लाख कुंतल पर सिमट कर रह गया है। धान उगाने वाले भी खुश नहीं हैं। औरैया और इटावा में धान मंडियां हैं पर उनसे काम नहीं चलता।

हालांकि, अखिलेश यादव ने रिकॉर्ड समय में आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे बनाकर लोगों में उम्मीद जगाई है क्योंकि इस राजमार्ग के किनारे चार मंडियां लगाने की योजना है पर वह जब आकार लेगी, तब लेगी। 

कानपुर देहात के अमराहट और राजपुर के बीहड़ या बंजर क्षेत्रों में सिंचाई पुराना मुद्दा रहा है पर 1989 में शुरू हुई अमराहट कैनाल योजना का तीसरा चरण अभी तक पूरा नहीं हुआ है। यही वजह है कि यहां के नौजवान पलायन करने को मजबूर हैं।
 
दिल्ली और एनसीआर के शहरों में अपमानजनक मासिक मानदेय पर नौकरी कर रहे चौकीदारों की रायशुमारी करा लीजिए। बड़ी संख्या में इसी इलाके के लोग मिल जाएंगे। ये वे खेतिहर हैं, जिन्होंने हरे-भरे खेतों में पीढ़ी दर पीढ़ी सोना उगाने की तालीम पाई पर आज कंकरीट के जंगल में गर्दिश के दिन गुजार रहे हैं। हमारे जनप्रतिनिधियों के बंगलों के बाहर भी वे तैनात मिलते हैं, मुरझाए से। अफसोस किसानों का कमोबेश पूरे देश में इसी तरह का हाल बेहाल है। यह विभीषिका कब खत्म होगी? 
कल, कानपुर का हाल।  

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  • Web Title:no one hear these bhumiputra pain