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20 अप्रैल, 2021|4:24|IST

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सियासत का मुजफ्फरनगर मॉडल

सियासत का मुजफ्फरनगर मॉडल

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ‘गन्ना बेल्ट’ जहां रसीले गन्नों की लहलहाती फसल से झूम रही है, वहीं चुनावी हलचलों ने तापमान बढ़ा रखा है। कोई सामाजिक ध्रुवीकरण की बात करता है, तो कोई सामाजिक अलगाव की। 2013 का हाहाकारी ‘मुजफ्फरनगर मॉडल’ किसी डरावने सपने की तरह रह-रहकर लोगों की यादों पर दस्तक देता रहता है। इसने 2014 के लोकसभा चुनावों की रूप और रंगत गढ़ी, क्या 2017 के विधानसभा चुनाव भी उसी रंग में सराबोर होंगे?

मुजफ्फरनगर जिले के अंदरूनी हिस्से में स्थित लालूखेड़ी में हम एक जीवंत संवाद के हिस्सेदार बने। सिसौली तिराहे के पास चाय की दुकान पर मौजूद लोगों का हाल-ए-दिल जानने में थोड़ा समय लगा। एक बार जब उनके मन की गांठें खुलने लगीं तो फिर उसमें जमा गर्द-ओ-गुबार फिजा में छा गया।

एक बुजुर्गवार ने कहा कि हम तो लहर पर वोट डालते रहे हैं पर पिछली लहर तकलीफदेह रही। मेरी‘बाईपास सर्जरी’ हो चुकी है और मैं लंबे समय तक कतार में नहीं खड़ा हो सकता। सुबह से बैंक के बाहर खड़ा था पर पैसा नहीं मिला। लड़के की शादी है। अब आप ही बताओ जी, करूं क्या?

उनके पीछे खड़े नौजवान ने जैसे तबले पे थाप दी कि अजी, हमारा तो सारा पैसा जब्त हो गया है। आठ-दस दिन बाद बैंक में पैसा आया था पर देखते-देखते ही खत्म हो गया। हमारे पास तो फूटी कौड़ी नहीं है। उनकी बात खत्म होती उससे पहले ही थोड़ी दूर खड़े एक सज्जन तैश में बोलने लगे। कैसी बातें करते हैं जी? हम एमएलए के चुनाव में वोट डालने जा रहे हैं। इस समय ऐसी चर्चा फिजूल की है। पहले विधानसभा के मुद्दों पर बात करो। हमारा तो विधायक चुने जाने के बाद शक्ल तक दिखाने नहीं आया। मैंने हंसकर पूछा, ‘और एम.पी.?’ उसने कहा, ‘जी वो भी नहीं आया।’ सबको यह दर्द सालता है कि नेता जी और उनके नुमाइंदे जीत या हार के बाद गायब हो जाते हैं।

मैंने सोचा कि नोटबंदी का मुद्दा खत्म हो गया है, तभी अचानक एक सज्जन बोले कि बैंक की बात तो छोड़ो, चलो एटीएम चलकर दिखा दूं। वहां कुत्ते लोट रहे हैं। इस बार कोलाहल ने समूचे माहौल पर कब्जा कर लिया। कोई नोटबंदी के पक्ष में था, कोई विपक्ष में। नोटबंदी बहस का मुद्दा है पर क्या वह मतदान पर असर डालेगी? संभावना कम लगती है।

बात आगे बढ़ाने की गरज से मैंने पूछा कि आपको फसलों का उचित मूल्य मिलता है? जवाब बेहद तल्ख था कि किसान तो कर्ज में डूबा हुआ है। सरकारें कर्जा-माफी की घोषणा करती हैं और फिर नए ऋण का आश्वासन देती हैं। हम बैंक और साहूकारों में फंसकर रह गए हैं। इससे अच्छा तो यह हो कि हमें फसल की वाजिब कीमत मिले ताकि हम कर्जे निपटा सकें और खेती-किसानी को नया आयाम दे सकें। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का यह भाग साहूकारों के मकड़जाल में फंसकर छटपटाने के लिए कुख्यात है।

दुर्भाग्य देखिए। इसी इलाके से चौधरी चरण सिंह ने अपनी सियासत शुरू की थी। लोग अक्सर इस भ्रम में आ जाते हैं कि वे सिर्फ जाटों के नेता थे। यह सच है कि जाट उनका आधार वोट बैंक थे, पर उन्होंने पहली बार इस इलाके में किसानों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी पुरानी समस्याओं को सड़क से लेकर संसद तक उठाया। इस क्षेत्र में महेन्द्र सिंह टिकैत जैसे किसान नेता पैदा हुए, जिनकी एक आवाज पर हजारों लोग इकट्ठा हो जाते। मुद्दे तब भी वही थे, मुद्दे आज भी वही हैं।

नेता आए, चले गए। चुनाव आए, चले गए। एक बार फिर चुनाव दहलीज पर खड़े हैं पर किसानों के गंभीर मुद्दों पर विमर्श के लिए कोई तैयार नहीं है। मैंने पूछा कि ऐसा क्यों है?

सबने एक स्वर में नेताओं को गरियाना शुरू कर दिया। आप इस चुनाव में वोट मांगने वालों के सामने पूरी जोरदारी से अपनी बात क्यों नहीं रखते? जवाब में तरह-तरह की आवाजें उठीं जिनका सार यह था कि वो तो सिर्फ अपनी बिरादरी या धर्म वालों के पास वोट मांगने आते हैं। हर आदमी तक जाने की जहमत तो कोई उठाता ही नहीं।
जाति और धर्म के वही ठेकेदार कभी ‘विकास’ तो कभी ‘जातीय सौदेबाजी’ अथवा ‘धर्म खतरे में है’ के नारे के साथ एक बार फिर मैदान में हैं।

लोगों के दिल-ओ-दिमाग पर उनका कितना कब्जा है, यह समझने के लिए हमने पूछा कि आपकी नजर में धर्म, जाति और विकास में बड़ा कौन है? चतुराई भरा उत्तर मिला, पहले सुरक्षा फिर विकास। क्या यह बताने की जरूरत है कि सुरक्षा से उनका मतलब जातीय और धार्मिक लामबंदी से था? क्या मुजफ्फरनगर मॉडल फिर से पुरजवां हो सकता है।

...जारी


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