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20 अप्रैल, 2021|3:34|IST

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अखिलेश को अपने घर में जूझना होगा

अखिलेश को अपने घर में जूझना होगा

औरैया के रास्ते पर हमने शहर की सीमा लांघी ही थी कि दोनों ओर लहलहाती सरसों और गेहूं की फसलों ने मन मोह लिया। लगा मल्लिका पुखराज यहीं कहीं पास में गुनगुना रही हैं -
‘फूली हुई है सरसों/फूली हुई है सरसों/गोया रहेगी बरसों।’

इनसानों की सुर्ख फसलें भी कभी बिसराए अतीत का हिस्सा बन जाती हैं, यह पहले सवाल ने ही तय कर दिया। पास से गुजरते एक नौजवान से मैंने पूछा कि समाजवादी आंदोलन का सबसे बड़ा नेता कौन है? उसका जवाब था- अखिलेश यादव...मुलायम सिंह। मैंने पूछा ‘कमांडर साहब’ का नाम सुना है? उसने सिर हिला दिया। आज के नौजवानों के लिए यह जानना जरूरी है कि चंबल के बीहड़ों से सेंगर नदी के घुमावदार दोआब तक कभी समाजवादी आंदोलन फला-फूला करता था। आजादी से पहले समाजवादियों ने यहां लाल सेना बनाई थी, जिसका काम जबरन सरकारी कामकाज बाधित करना था। नौजवानों के इस दल के नेता के रूप में उभरे थे, अर्जुन सिंह भदौरिया। लोहिया, जयप्रकाश नारायण और आचार्य कृपलानी जैसे दिग्गजों ने उनके करतबों को देख उन्हें कमांडर कहना शुरू कर दिया था। यह विशेषण उनके नाम से ताजिंदगी चिपका रहा। 

लोकतांत्रिक भारत में वे तीन बार लोकसभा के लिए चुने गए। उनकी पत्नी भी राज्यसभा का चुनाव जीतीं। मुलायम सिंह यादव ने जिन लोगों से राजनीति का ककहरा सीखा उनमें कमांडर साहब भी हुआ करते थे। यह बात अलग है कि 2004 में जब उन्होंने आंखें मूंदी, तब तक समाजवाद और समाजवादियों ने नई रंगत हासिल कर ली थी।

इटावा, मैनपुरी, फिरोजाबाद और औरैया ऐसे जिले हैं जहां ‘समाजवादी परिवार’ का खासा रसूख है। क्या वह इस चुनाव में भी कायम रहेगा? एक बालिका इंटर कॉलेज की प्रिंसिपल ने बताया कि अखिलेश यादव ने ‘महिला हेल्पलाइन’ शुरू कर हमारी तकलीफ को बहुत कम किया है और उनकी हुकूमत में चौतरफा विकास हुआ है। हमारा वोट उन्हीं को पड़ेगा। 

क्या पारिवारिक कलह का असर चुनाव पर नहीं पड़ेगा? मेरे इस सवाल के जवाब में एक वरिष्ठ अधिवक्ता का कहना था कि सब जानते हैं कि यह घर की लड़ाई है, और आज नहीं तो कल वे एक हो जाएंगे इसलिए कोई इसमें पड़ना नहीं चाहता। दूसरे वकील ने इसका प्रतिवाद किया। वे शिवपाल यादव के पड़ोसी हैं और उन्हें भाई साहब कहते हैं। उन्होंने बिना संकोच कहा कि भाई साहब के साथ अच्छा नहीं हुआ और इसका चुनाव पर असर देखने को मिल सकता है।

कुछ अन्य लोगों का कहना था अतीत में नगरपालिका चुनाव सहित तमाम अवसरों पर कुछ फैसले ऐसे हुए जिनसे सपा के परंपरागत समर्थकों को निराशा हुई। हालांकि, लोगों का मानना है कि यदि ‘नेताजी’ या ‘अखिलेश भैया’ एक रात रुककर लोगों से बात कर लेंगे तो उनके आंसू पुछ जाएंगे।

कहने की जरूरत नहीं है कि बसपा और भाजपा इस कलह का लाभ उठाने को उत्सुक हैं। उन्होंने चुनावी बिसात इसी आधार पर बिछाई है। यकीनन, अखिलेश यादव को अपना ‘घर’ फिर से जीतने के लिए मशक्कत करनी होगी। चुनाव कोई जीते या कोई हारे, पर आलू, गेहूं और सरसों की फसल के जरिये जिंदगी बसर करने वाले स्थानीय किसानों के हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। उनकी बिजली, पानी, खाद और कर्ज संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए आजादी से अब तक गंभीर प्रयास नहीं हुए हैं। तकदीर के मारे और राजनेताओं द्वारा बिसराए इन भूमिपुत्रों के बारे में चर्चा कल के अंक में। 

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  • Web Title:akhilesh will have to contend in their home