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हमारे संत/ पीपा जी

जो ब्रह्मण्डे, जो खोजै सो पावै।
पीपा प्रणवै परम ततु है सतगुरु होइ लखावै।।
जिन तत्वों से ब्रह्माण्ड बना है, उन्हीं तत्वों से मनुष्य का पिण्डाण्ड भी बना है। जो परमात्मा ब्रह्माण्ड में व्याप्त है, वही मनुष्य के पिण्ड-शरीर के भीतर भी है। भीतर बैठे परमात्मा को जो खोजता है, वही पाता है। पीपा कहते हैं, वही परमात्म तत्व मेरा गुरु है, मैं उसी को प्रणाम करता हूं।

यह पीपा जी की वाणी है, जो संत भी थे, ज्ञानी भक्त भी थे और ‘गागरोनगढ़’ के प्रतापी राजा भी थे, जिनके ऐश्वर्य, पराक्रम और शक्ति की कहानी घर-घर कही जाती थी। पहले ये आदिशक्ति भगवती के भक्त थे। एक बार कुछ वैष्ण भक्त राज्य के अतिथि हुए। राजा ने उनका समुचित स्वागत नहीं किया। वैष्णव भक्तों ने समझ लिया कि राजा भगवती और भगवान में भेद कर रहा है। इसे पता नहीं कि कृष्ण और काली एक ही हैं। संतों ने भगवती से प्रार्थना की और भगवती ने राजा को प्रेरणा दी कि तू काशी जाकर संत रामानंद की शरण ले। पीपा जी काशी गए। रामानंद जी ने कहा-‘भई, हम संन्यासी हैं। हमारे यहां भोग के पुतले राजाओं का क्या काम। हमें तो साधु वेशधारी साधक चाहिए।’ दूसरे दिन पीपा जी साधु वेश में पहुंच गए। रामानंद जी ने कहा ‘यदि ऐसी ही दृढ़ लगन है, तो जाओ कुएं में कूद जाओ। वहीं तुम्हें भगवान के दर्शन होंगे।’ पीपा जी कुएं में कूदने को दौड़े तो रामानंद जी के चेलों ने रोक लिया। पीपा जी परीक्षा में सफल हुए। स्वामी रामानंद जी ने उन्हें मंत्र दिया और उन्हें अपना शिष्य बना लिया। पीपा जी कुछ दिन काशी में ही रहे। गुरु की आज्ञा से जब जाने लगे तो रामानंद जी से प्रार्थना की-‘महाराज आप गागरोनगढ़ पधारें, तभी मैं अपनी गुरुभक्ति को सफल मानूंगा।’

रामानंद जी ने कहा-‘राजाधिराज पीपा। यदि तुम अपनी निष्ठा-साधना-आराधना में ऐसे ही दृढ़ रहे तो हम एक दिन अवश्य आएंगे।’ और ऐसा ही हुआ। महाराज पीपा की भक्ति, साधना, आराधना बढ़ती गई। उन्होंने रामानंद जी को गागरोन पधारने का पत्र लिखा। स्वामी रामानंद जी ने अपने 40 शिष्यों के साथ पैदल प्रस्थान किया। शिष्य मंडली में कबीर-रैदास आदि भी थे। बड़े आदर और राजसी ठाठ-बाट से स्वामी रामानंद जी का स्वागत हुआ। चारों ओर से हजारों दर्शनाभिलाषी गागरोन आए। उत्सव, महोत्सव, भंडारे, उपदेश और प्रवचन एक महीने तक चले। राजधर्म और आध्यात्म के क्षेत्र में चरमोत्कर्ष पर पहुंचे संतों में महाराज पीपा का अमिट स्थान है, जो हमेशा रहेगा।

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