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एक विराट व्यक्तित्व की आत्मीय यादें

10 अक्टूबर 2011 को डॉ. रामविलास शर्मा का जन्मशती वर्ष शुरू हो जाएगा। रामविलास शर्मा जैसी प्रतिभा और लेखन के प्रति समर्पण किसी भी भाषा के साहित्य में दुर्लभ ही कहा जाएगा। यहां उनसे जुड़े कुछ रोचक प्रसंग याद कर रहे हैं विश्वनाथ त्रिपाठी

रामविलास जी हिंदी साहित्य के ऐसे सितारे हैं, जिनकी किसी से तुलना नहीं हो सकती। उनके व्यक्तित्व के कई पक्ष हैं। एक पक्ष बहुत विवादास्पद है तो दूसरा बिल्कुल निर्विवाद। अपने लेखन में वे बहुत विवादास्पद हैं, लेकिन उनके जीवन और जीवन मूल्यों को लेकर शायद ही कोई उन पर उंगली उठा सके। यहां एक बात अजीब है कि हिंदी साहित्य और साहित्यकारों के विषय में उनकी स्थापनाएं प्राय: स्वीकार कर ली गई हैं, जैसे भारतेंदु, प्रसाद, प्रेमचंद, निराला, रामचंद्र शुक्ल आदि के बारे में। आज इन सब की वही छवि है, जो रामविलास शर्मा ने बनाई है। इस तरह उनकी प्राय: सभी स्थापनाएं हिंदी समाज में मान्य हैं।

लेकिन उनके लेखन को लेकर विवाद भी कम नहीं हैं। वैदिक साहित्य पर उन्होंने जो लिखा या सुमित्रनंदन पंत पर, राहुल सांकृत्यायन पर, यशपाल पर या मुक्तिबोध पर उन्होंने जो लिखा, उसे हिंदी साहित्य और हिंदी समाज ने स्वीकार नहीं किया। निर्विवाद वे अपनी ईमानदारी, चारित्र्य और आस्था को लेकर हैं। यह ऐसा क्षेत्र है, जहां उनके विरोधी भी उन पर उंगली नहीं उठा सकते। इस बिंदु पर समकालीन परिदृश्य में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं दिखता, जिसकी कथनी-करनी में इतना साम्य हो। मेरे उनसे व्यक्तिगत संबंध थे। अक्सर मजााक में वे मुझे उपदेश दिया करते थे कि अगर लेखक बनना है तो चार-पांच चीजें जरूरी हैं। सबसे पहला यह कि आदमी की कलाई मजबूत होनी चाहिए। दूसरा रोज सुबह उसे दो घंटे व्यायाम करना चाहिए, बादाम खाना और लंगोट का पक्का होना चाहिए।

डॉ. रामविलास शर्मा से मेरी पहली मुलाकात 1954 में हुई थी। मुझे वे बहुत मानते थे। मैंने जब उनकी ‘निराला की साहित्य साधना’ पढ़ी तो मुझे वह बहुत अच्छी लगी। मैंने वह किताब अपने पिताजी को पढ़ने को दी, जिनकी औपचारिक शिक्षा बहुत ही कम थी। वे कक्षा एक पास थे। लेकिन पिताजी ने जब वह किताब पढ़ी तो मुझे पत्र लिखा कि ‘किताब बहुतइ नीक है, आनद आया’। मैंने यह बात डॉ. शर्मा को बताई तो वे बड़े खुश हुए और बोले कि मेरा लिखना सार्थक हो गया। मैं जिन लोगों के लिए लिखता हूं, उन्हें वह समझ में आती है और अच्छी लगती है।

डॉ. शर्मा मजाक भी बहुत करते थे। खासकर डॉ. नामवर सिंह का तो बहुत ही मजाक उड़ाते थे। लेखन में दोनों का आपस में बहुत विरोध था। हालांकि नामवर जी उनका बहुत सम्मान करते थे। एक बार वे नामवर जी से कहने लगे कि जानते हो नामवर मैं तुम्हारे खिलाफ क्यों हूं? नामवर जी ने पूछा-क्यों? तो वे बोले, इसलिए कि पहले जब तुम मेरा लिखा चुराते थे तो मैं खुश था, लेकिन अब तुम विजयदेव नारायण साही का लिखा चुराने लगे हो, इसलिए मैं तुम्हारे खिलाफ हूं।

डॉ. शर्मा बहुत शिष्ट और संवेदनशील व्यक्तित्व के धनी थे। एक बार मैं उनसे मिलने उनके घर गया। बातें होने लगीं। डॉ. शर्मा लगातार सिगरेट पी रहे थे। थोड़ी देर बाद मुझे भी तलब लगने लगी। सो मैंने भी अपनी जेब से सिगरेट निकाल ली। मेरे सिगरेट निकालते ही डॉ. शर्मा दुखी हो गए और यह कहते हुए आठ-दस बार मुझसे माफी मांगी कि सॉरी, मैं भूल गया था, मैंने तुम्हें सिगरेट ऑफर नहीं की। मैं उम्र और योग्यता में उनसे बहुत छोटा था, लेकिन यह प्रसंग उनकी शिष्टता का एक प्रमाण है।

डॉ. शर्मा का एक बड़ा गुण यह था कि मैंने कभी उन्हें किसी की व्यक्तिगत निंदा करते नहीं सुना। त्रिलोचन शास्त्री से वे बहुत मजाक करते थे। एक बार त्रिलोचन जी के बारे में बातें हो रही थीं। हमने सुना था कि एक बार त्रिलोचन जी अपनी मस्ती में कहीं चले जा रहे थे। उनके सामने से एक ऊंट आया, लेकिन शास्त्रीजी को अपनी मस्ती में ऊंट दिखा ही नहीं और वे ऊंट की टांगों के बीच से निकल गए। इस पर रामविलास जी ने कहा कि नहीं, त्रिलोचन ऊंट की टांगों के बीच से नहीं निकले थे, बल्कि ऊंट त्रिलोचन की टांगों के बीच से निकल गया था।

वर्ष 1916 के आसपास की एक किताब थी-संपत्तिशास्त्र, जिस पर डॉ. रामविलास शर्मा ने 1980 में एक बहुत महत्त्वपूर्ण लेख लिखा था, जिसे पढ़ कर त्रिलोचन जी ने डॉ. शर्मा को बधाई दी और कहा कि रामविलास, तुमने संपत्तिशास्त्र पर लिख कर बहुत अच्छा किया। मुझे भी किताब बहुत महत्त्वपूर्ण लगी थी, मैंने तो इसे 1925 में ही पढ़ लिया था। त्रिलोचन जी की इस बात पर डॉ. शर्मा ने कहा कि त्रिलोचन, ऐसी कोई किताब है, जो तुमने मुझसे पहले न पढ़ी हो।

डॉ. रामविलास शर्मा, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन आपस में बहुत घनिष्ठ मित्र थे। उनकी मित्रता और संवेदनशीलता से जुड़ा एक प्रसंग मुझे कभी नहीं भूलता। बांदा में केदार जी का सम्मान हो रहा था। मंच पर डॉ. रामविलास शर्मा, नागार्जुन और केदार तीनों ही बैठे थे। उसी समय किसी ने नागार्जुन की एक मैथिल कविता पढ़ कर सुनाई, जिसमें कवि अपनी वृद्धा पत्नी से पूछता है कि मेरी उंगली पकड़ कर बताओ कि शादी के समय मैंने तुम्हारी मांग में सिंदूर कहां डाला था। यह कविता सुनते हुए मैंने देखा कि मंच पर तीनों दोस्त रुआंसे हो गए थे और उनके होंठ फड़फड़ा रहे थे। दरअसल, इस समय तक तीनों मित्रों की पत्नियां इस संसार से जा चुकी थीं। बहरहाल, डॉ. रामविलास शर्मा को अपने जीवनकाल में सम्मान भी बहुत मिला। वे कोई धनी व्यक्ति नहीं थे। सामान्य मध्यवर्गीय जीवन था, लेकिन जितने भी सम्मान उन्हें मिले, उसका सम्मान तो उन्होंने ले लिया, लेकिन किसी की धनराशि उन्होंने ग्रहण नहीं की। सारा धन उन्होंने समाज को दे दिया। ऐसे समय में जब अदना से अदना लेखक भी कितनी बार विदेश यात्राएं कर लेता है, डॉ. शर्मा कभी विदेश नहीं गए। डॉ. शर्मा दिल्ली में कई वर्ष रहे, लेकिन उनका कोई चित्र किसी नेता या मंत्री के साथ नहीं मिलता। जब उन्हें व्यास सम्मान मिला तो खुद बिड़लाजी उन्हें वह सम्मान देने उनके घर गए। यह बिड़लाजी का बड़प्पन भी था और डॉ. शर्मा के प्रति उनका सम्मान भी।

डॉ. शर्मा मार्क्सवादी थे। वे मार्क्सवाद को सिद्धांत से अधिक चिंतन पद्धति मानते थे और मार्क्सवाद को लेकर उनके मन में कोई अंधविश्वास नहीं था। इसीलिए उनके कई ऐसे समीकरण हैं, जो स्थापित समीकरणों से मेल नहीं खाते। डॉ. रामविलास शर्मा सर्वहारा की तानाशाही का सिद्धांत नहीं मानते थे। वे कहते थे कि सर्वहारा का वर्चस्व व्यवस्था में हो, तानाशाही में नहीं, क्योंकि किसी भी स्थिति की तानाशाही अंतत: तानाशाही को ही बढ़ावा देती है। जहां तक मेरी जानकारी है कि सर्वहारा की तानाशाही के बारे में उनका यह मत यूरो कम्युनिज्म से पहले का है। मार्क्सवादी सिद्धांतकार के रूप में डॉ. शर्मा का योगदान यह है कि उन्होंने इस चिंतन पद्धति का उपयोग स्वतंत्र रूप से भारतीय संदर्भ में किया और हिंदी के पाठकों के दिमाग से यह भ्रम दूर कर दिया कि मार्क्सवाद विदेशी विचारधारा है, इसलिए हम उसे स्वीकार नहीं कर सकते।

डॉ. शर्मा लखनऊ विश्वविद्यालय के अंग्रेजी के पहले पीएचडी थे। उन्होंने ‘प्री रीफेलाइट्स इन कीट्स’ पर अपना शोध प्रबंध लिखा था, लेकिन लेखक वे हिंदी के रहे। उनका व्यक्तित्व खुद में अभिभूतकारी है। उसका बहुत बड़ा कारण यह है कि वे स्पष्ट, निर्भीक और खरी बातें करते थे। वे निराला के योग्य सहचर थे। उन्होंने अनेक दशकों तक निराला साहित्य का मंथन करके ‘निराला की साहित्य साधना’ लिख कर अगर इस महाकवि की व्याख्या न की होती तो आज निराला साहित्य की क्या स्थिति होती, हम नहीं कह सकते। डॉ. रामविलास शर्मा ने 1934 में ही यह घोषणा कर दी थी कि निराला बायरन के समतुल्य नहीं, उनसे बड़े कवि हैं।

निराला, प्रेमचंद, किशोरीदास वाजपेयी और रामचंद्र शुक्ल को उन्होंने विश्वस्तर की प्रतिभा कहा और उनकी प्रतिभा का ऐतिहासिक आधार प्रस्तावित किया। डॉ. शर्मा का मत है कि भारतीय नवजागरण यूरोपीय नवजागरण से अधिक व्यापक था। यूरोपीय नवजागरण को केवल सामंतवाद से लड़ना पड़ा, लेकिन भारतीय नवजागरण को सामंतवाद और साम्राज्यवाद दोनों से निपटना पड़ा। हमारे स्वाधीनता आंदोलन का सांस्कृतिक आधार भी अधिक व्यापक और संघर्षशील था। उसी का परिणाम है भारतीय भाषाओं के साहित्य का अभूतपूर्व उत्कर्ष।

डॉ. रामविलास शर्मा ने हिंदी जातीयता को सैद्धांतिक रूप से प्रस्तावित किया। उनके विचार से बंगाली, मराठी, तमिल, तेलुगू, पंजाबी आदि जातीयताओं के समान एक विशाल हिंदी जाति है। हिंदी जाति को उन्होंने महाजाति कहा, क्योंकि इसके अंतर्गत अवधी, भोजपुरी, पर्वतीय जैसी अनेक जातीयताएं हैं। डॉ. शर्मा की यह प्रस्तावना मौलिक और अभूतपूर्व है। उनके विचार से जातीयता की भावना सांप्रदायिकता रोकने में बहुत कारगर होगी। वे उर्दू को हिंदी से अलग भाषा न मानते हुए भी उसकी एक विशिष्ट स्थिति स्वीकार करते हैं और भाषा और संस्कृति के क्षेत्र में सांप्रदायिक भेदभाव को नहीं मानते।

डॉ. शर्मा की सभी स्थापनाओं और मान्यताओं को हिंदी समाज ने स्वीकार नहीं किया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता बी.टी. रणदिवे डॉ. शर्मा को बहुत मानते थे। डॉ. शर्मा ने सुधारवाद और विसजर्नवाद के विरुद्ध जो आग्रही लेखन किया, उसे हिंदी समाज ने स्वीकार नहीं किया। सुमित्रनंदन पंत, राहुल सांकृत्यायन, यशपाल, मुक्तिबोध और हजारीप्रसाद द्विवेदी पर लिखे गए उनके लेख एकांगी और बहुत दूर तक दुराग्रही समङो गए, इसीलिए इन साहित्यकारों की जो छवि हिंदी समाज में बनी हुई थी, उसे डॉ. शर्मा का लेखन धूमिल नहीं कर पाया। डॉ. शर्मा का योगदान संस्कृति के अनेक क्षेत्रों में है, विशेष रूप से संगीत के क्षेत्र में। हिंदी के प्रगतिशील और जनवादी लेखन में अपने अतीत के प्रति एक विडंबनापूर्ण जेहादी मनोवृत्ति रही है। ऐतिहासिक उत्तराधिकार के तिरस्कार की मनोवृत्ति। वे प्राचीन साहित्य पर विचार करना प्राचीनतावादी होना समझते हैं। और इसीलिए डॉ. शर्मा के वैदिक अध्ययन को वे उचित सम्मान नहीं दे पाते। वे नहीं देखते कि डॉ. शर्मा ने वैदिक मंत्रों की रचना में शिल्पियों को कितना महत्त्वपूर्ण माना है। ऋग्वेद के काव्य सौंदर्य का कैसा मूल्यांकन किया है। वे मनुष्य के ऐतिहासिक उत्तराधिकार को अस्वीकार करने को ही आज की वैज्ञानिक विचारधारा मानते हैं। आज ऐसे अनेक विवादों का आधार है, जिन पर नई पीढ़ी विचार कर रही है। 
(शशिभूषण द्विवेदी से बातचीत पर आधारित)

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