DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

स्टैंडबाई

आशुतोष गोवारिकर की फिल्म ‘लगान’ के अति चर्चित होने के बाद खेल को केन्द्र में रख कर फिल्म बनाने का सिलसिला ही चल पड़ा। पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसी फिल्में आई हैं, जिनमें खेल-संसार की असलियत और उसकी विसंगतियों को विस्तार से दिखाने का प्रयास किया गया है। हालांकि इनमें कुछ फिल्मों के निर्देशकों के लिए खेल तो मात्र बहाना था, मूलत: उन्हें ग्लैमर और रोमांस से ही मतलब था।

शिमीत अमीन के निर्देशन में बनी फिल्म ‘चक दे इंडिया’ और नागेश कुकुनूर की ‘इकबाल’ में खेल जगत के अधिकारियों के पक्षपात और ईमानदार खिलाड़ी के जज्बे को जिस संवेदना के साथ दिखाया गया है, वह इन दोनों फिल्मों को ‘क्लासिक’ का दर्जा दिलाती है। लेकिन इसके उलट निखिल आडवाणी की ‘पटियाला हाउस’ तथा विवेक अग्निहोत्री की ‘धन धना धन गोल’ में खेल की दुनिया को ग्लैमर और थ्रिल के साथ पेश किया गया था। खेल की उत्तेजक संवेदना को फार्मूलों में बांधने की कोशिश की गई थी।

खेल फिल्मों की इस पृष्ठभूमि में संजय सुरकर की फिल्म ‘स्टैंडबाई’ ‘चक दे.’ और ‘इकबाल’ की परंपरा में है। अपनी मराठी फिल्मों के लिए चार बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित संजय सुरकर ने ‘स्टैंडबाई’ में खेल की दुनिया के अंतर्गत खिलाड़ियों की चयन संबंधी विसंगतियों का पर्दाफाश करने के साथ ही उनकी कभी न टूटने वाली आशा को बेहद प्रभावी तरीके से दिखाया है।

‘स्टैंडबाई’ में दो खिलाड़ियों राहुल नार्वेकर और शेखर वर्मा की कहानी कही गई है। दोनों उच्च कोटि के खिलाड़ी हैं और महाराष्ट्र की ओर से खेलते हैं। वे अपने खेल से भारत को शीर्ष पर पहुंचाना चाहते हैं। वे अपनी मेहनत से संतोष ट्राफी जीत लेते हैं, लेकिन अचानक परिस्थिति बदलती है और महाराष्ट्र टीम को जिताने वाले कैप्टन शेखर का चयन अगली टीम में नहीं होता। अंतत: उसका चयन स्टैंडबाई स्ट्राइकर के रूप में होता है। इस पूरे प्रसंग में चयन प्रक्रिया के दौरान पक्षपात का जो चेहरा फिल्म में दिखाई देता है, वह बहुत भयावह है।

निर्देशक ने मुख्य अभिनेताओं के रुप में नए लोगों को लिया, ताकि युवा खिलाड़ियों का प्रतिनिधित्व हो सके। दोनों ही युवा लीड एक्टर सिद्धार्थ खेर और आदिनाथ कोठारे बेहद क्षमतावान हैं। सिद्धार्थ खेर ने तो ‘तीन पत्ती’ में अमिताभ बच्चन के साथ काम किया था। दिलीप ताहिल और अवतार गिल ने भी अपने सहज अभिनय से ध्यान खींचा।

निर्देशन और पटकथा के स्तर पर फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता है उसकी रोमांचक गतिशीलता। फिल्म के आखिरी दो मैच ‘लाइव शूट’ किए गए थे, इसीलिए ये दृश्य हमें गहरी रोमांचक उत्तेजना से भर देते हैं। कहानी का नया प्लॉट होने के कारण उसकी प्रस्तुति में ताजगी है। यही इस फिल्म की सफलता है।

स्वानंद के गीतों में संवेदना का अभाव है। लगता है धुनों में खोखले शब्द पिरो दिए गए हैं। मैच के फिल्मांकन में सिनेमेटोग्राफी का कमाल हमें आश्चर्यचकित कर देता है। प्यार की कहानी से आगे भी स्क्रीन पर कहने को बहुत कुछ है। ‘स्टैंडबाई’ इसका एक बढ़िया उदाहरण है।

सितारे: आदिनाथ कोठारे, सिद्धार्थ खेर, सचिन खेड़ेकर, दिलीप ताहिल, अवतार गिल, रीमा वोरा, नागेश भोंसले आदि
निर्माता: प्रकाश चौबे
निर्देशक: संजय सुरकर
संगीत: आदेश श्रीवास्तव
गीत: स्वानंद किरकिरे

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:स्टैंडबाई