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माघ मेला यानी समस्त पापों का शमन

सृष्टि के साथ ही प्रयाग में माघ मेले का प्रादुर्भाव हुआ। ब्रह्मा ने दशाश्वमेध यज्ञ अकेले बैठकर नहीं किया था, निश्चय ही देवताओं तथा ऋषियों का जनसमूह उस यज्ञ में अपनी-अपनी हवि लेने के लिए एकत्र हुआ होगा। 

‘प्रयाग’ अर्थात् प्र+याग यानि यज्ञों की बहुलता का स्थल, जहाँ अत्यधिक यज्ञ होते रहे हों, ऐसी यज्ञ भूमि का नाम है- प्रयाग। किसी समय संगम से लेकर श्रृंग्वेरपुर तक प्रयाग वन था। 88 हजार ऋषि-मुनियों के आश्रम थे। बाल्मीकि रामायण में प्रयाग वन की चर्चा की गई है।

उस समय 20 योजन तक प्रयाग एक तपोभूमि के रूप में जाना जाता था। यमुना पार में पर्ण मुनि का आश्रम, जहाँ वर्तमान में पनासा नाम का गाँव है, ऋषियन, चित्रकूट, विन्ध्य पर्वत की श्रृंखला, गंगापार में दुर्वासा आश्रम, पाण्डेश्वर महादेव, श्रृंग्वेरपुर तथा दुआब में कौशाम्बी कड़ा तक इसका विस्तार था। प्रतिष्ठानपुर (झूँसी), अलर्कपुरी (अरैल), ये सभी स्थल तपोभूमि, यज्ञ भूमि के रूप में जाने जाते थे। प्रयाग का अक्षय वट अपने-आप में इस स्थल की प्राचीनता का प्रमाण है। प्रलयकाल में भी जिसका क्षय नहीं होता, वह अक्षय वट है।

करार विन्देन पदार विन्देन
मुखार विन्देन विनि वेश्यन्तम
वटस्य पत्रस्य पुटे श्यानं
बालं मुकुन्दम् शिरसा नमामि॥
यह वृक्ष, प्रयाग तथा त्रिवेणी मृत एवं अमृत तत्वों से उद्भूत बुद्धि एवं विकास की ऐसी अजस्त्र धारा है, जिसमें अवगाहन कर प्राणी धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष चतुर्दिक पुरुषार्थ की प्राप्ति करता है। गोस्वामी तुलसीदास विरचित रामचरित मानस एक प्रामाणिक ग्रन्थ है। यदि बालकाण्ड की पंक्तियों पर गौर करें, तो प्रयाग के मेले की प्राचीनता के प्रमाण की आवश्यकता न होगी।

माघ मकर गति रवि जब होई।
तीरथ पतिहिं आव सब कोई॥
देव दनुज किन्नर नर श्रेनी।
सादर मज्जहिं सकल त्रिवेनी॥
पूजहि माधव पद जल जाता।
परसि अखय वटु हरषहि गाता॥
भरद्वाज आश्रम अति पावन।

इससे पूर्व भगवान शिव ने स्वयं इसकी रचना अपने मानस में कर रखी थी। ‘रचि महेश निज मानस राखा, पाइ सो समय शिवा सन भाषा॥’ स्पष्ट है कि प्रयाग का यह उत्सव अनन्त काल से चला आ रहा है। इसे प्रशासनिक व्यवस्था की परिधि में बाँधकर नहीं देखना चाहिए। वेदों में प्रयाग की त्रिवेणी ‘सित’ और ‘असित’, ‘सितासिते’ के शब्द से अभिहित है।

सच पूछिए तो ‘संगच्छध्व, संबदध्व’ की भावना से प्रेरित रहे हैं ये तीर्थ और मेले। इन्होंने ही अनेकता में एकता स्थापित करने का कार्य किया है, उस समय संचार का माध्यम रहे हैं। इन्हें दो प्रकार के तीर्थो में विभाजित किया गया है। प्रथम ‘मौन तीर्थ’ तथा दूसरा ‘मानस तीर्थ’। पवित्र नदियों में स्नानादि तीर्थ मोक्ष तीर्थ माने गए हैं। इनके अलावा सत्य, क्षमा, इन्द्रिय, निग्रह, भूत, प्रदत्त दान, संतोष, प्रियवादिता ब्रह्मचर्य, ज्ञान धृति एवं तापस ये सभी मानस तीर्थो से युक्त व्यक्ति को मौन तीर्थ की यात्रा करने का पूर्ण फल देते रहे हैं।

पद्म पुराण में तीर्थराज प्रयाग को सभी तीर्थों में सर्वोपरि माना गया है। नैमिषारण्य में ऋषियों के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के उपाय पूछने पर सूत जी ने देव खात, दैव खात, कुछ ऋषियों तथा सिद्धों द्वारा खोजे गए तीर्थो, काम्य, नित्य काम्य, नैमित्तिक, पापनाशी तीर्थो का वर्णन किया है- ‘कलियुग में जब अनेकानेक दोषों, पापों से मानव की बुद्धि-विवेक शून्य हो जाती है, उसे राजैसी और तामसी प्रवृत्तियाँ मोहपाश में बाँध लेती है, ऐसी स्थिति में तीर्थ यात्रा और भगवन्नाम ही उद्धार का सुगम मार्ग है।

‘गंगा-यमुना के दर्शन से यह धरती और भी पवित्र है। इसे राजा का मान प्राप्त है। सभी तीर्थो में विशेष कर तीर्थराज प्रयाग में आधि दैविक शक्तियाँ पूर्ण रूप से विकसित होती हैं। इसलिए यहाँ प्राणियों को पूर्णतया मुक्ति प्राप्त होती है।’

ब्रह्माजी ने तीर्थराज के इस महात्म्य को सुनकर इन्द्रादि देवताओं को बताया, तब सभी देवताओं ने प्रयाग पर ही विश्वास करने का निश्चय किया और यहाँ की पवित्र भूमि में किए गए धर्म-कर्म का आदर करने लगे। यह ऐसी पवित्र भूमि है कि यदि यहाँ पाप न किया गया हो तो अन्यत्र किए गए पाप यहाँ धुल जाते हैं।

मार्कण्डेय जी युधिष्ठिर को उपदेश करते हुए कहते हैं, ‘त् प्रयाग को जा, दर्शनों तथा गंगा यमुना के स्नान उनके पूजा एवं स्मरण से मनुष्य के पाप धुल जाते हैं। भगवान विष्णु देवताओं के साथ प्रयाग के सर्वमान मण्डल की रक्षा करते तथा इच्छित पदार्थ प्रदान करते हैं।

प्रयाग से- प्रतिष्ठानपुर (झूँसी) एवं वासुकी तालाब के अग्र भाग जहाँ पर कम्बल अवतर तथा बाहु मूलक नामक नागगण निवास करते हैं, तीनों लोकों में विश्रुत प्रजापति ब्रह्मा का क्षेत्र कहा जाता है। यहाँ अक्षय वट की रक्षा भगवान शंकर स्वयं त्रिशूल धारण कर करते हैं। अतएव सम्पूर्ण देवताओं के द्वारा रक्षित इस प्रयाग में मनुष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर एक मास तक निवास करना चाहिए और पितरों तथा देवताओं को विधिवत तर्पण करना चाहिए। यहाँ निवास करते हुए प्राणियों की अभिलषित मनोकामनाएँ पूरी होती हैं।

स्नान के नियम
माघ में मलमास पड़ जाए तो मासोपवास चन्द्रायण आदिव्रत मलमास में ही समाप्त करें और स्नान दानादि द्विमास पर्यन्त चलेगा। ऐसे ही नियम कुम्भ, अर्धकुम्भ के समय भी हैं।

पौष शुक्ल एकादशी से अथवा पूर्णमासी से अथवा अमावस्या से मान स्नान प्रारम्भ करना चाहिए। स्नान का समय उत्तम-तारागण निकले रहें, मध्यम-तारा लुप्त हो जाएँ, निष्कृष्ट-सूर्योदय स्नान होता है। प्रयाग में माघ मास तक रहकर जो व्यक्ति कल्पवास तथा यज्ञ, शय्या, गोदान, ब्राह्मण भोजन, गंगा पूजा, वेणीमाधव पूजा, व्रतादि और दानादि करता है, उसका विशेष महत्व तथा पुण्य होता है।

माघमासे गमिष्यन्ति गंगायमुनसंगमे।
ब्रह्माविष्णु महादेवरुद्रादित्यमरुदगणा:॥
अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, रुद्र, आदित्य तथा मरुद्गण माघ मास में प्रयाग राज के लिए यमुना के संगम पर गमन करते हैं।

प्रयागे माघमासे तु त्र्यहं स्नानस्य यद्भवेत्।
दशाश्वमेधसहस्त्रेण तत्फलं लभते भुवि॥
प्रयाग में माघ मास के अन्दर तीन बार स्नान करने से जो फल होता है, तो फल पृथ्वी में दस हजार अश्वमेध यज्ञ करने से भी प्राप्त नहीं होता है।

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