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लूट

नोबेल पुरस्कार विजेता दक्षिण अफ्रीकी लेखिका नाडिन गॉर्डिमर की इस 13 जुलाई को मृत्यु हो गई। नाडिन गॉर्डिमर ताउम्र रंगभेद की नीतियों के खिलाफ सक्रिय रहीं। दक्षिण अफ्रीका के साहित्य के प्रतिनिधि स्वर के रूप में उनकी पहचान थी। श्रद्धांजलि स्वरूप प्रस्तुत है उनकी एक कहानी

हमारे समय में एक बार की बात है। भूकंप आया। रिक्टर स्केल के आविष्कार के बाद आए भूकंपों में यह सबसे भयानक था। इसने महादेश के तटीय-क्षेत्र को हिलाकर रख दिया। ऐसे भूचाल अक्सर बाढ़ लाते हैं, लेकिन इस बार ठीक उल्टा हुआ। समुद्र काफी पीछे खिसक गया। इस तरह से संसार के कई राज अपने आप उजागर हो आए: समुद्र की तलछटी में जहाजों और मकानों के अवशेष थे, नाच-घर के फानूस, टॉयलेट शीट, समुद्री डाकुओं की तिजोरियां, टीवी स्क्रीन, रेल के डिब्बे, विमान के कई टूटे-फूटे हिस्से, संगमरमर की मूर्तियां, राइफलें, एक पर्यटक बस का ढांचा, गिरिजाघर की कलाकृतियां, बर्तन धोने की मशीन, कंप्यूटर, मयानों में पड़ी तलवारें और पत्थरों में तब्दील हो चुके सिक्के थे।

स्थानीय लोग हक्के-बक्के-से चीजों की तरफ टकटकी लगाए हुए भागे। पहाड़ी पर अपना घर-बार, जो कुदरती आपदा का काफी हद तक शिकार हो चुका था, छोड़कर वे नीचे उस ओर भागे, जहां से कभी टकराती चट्टानों की आवाजें और समुद्री गजर्नाएं डराती थीं, परंतु आज वहां सन्नाटा पसरा हुआ था। ऐसा लग रहा था कि इन वस्तुओं को समुद्र ने उगल दिया हो और वहां कभी पानी था ही नहीं। अगर कुछ था, तो अतीत व वर्तमान की ढेर सारी निशानियां, तरह-तरह की भौतिक चीजें। ये सब बेतरतीब ढंग से बिखरी पड़ी थीं, जैसे सब हैं या नहीं हैं या फिर सबका भोग एक साथ संभव है।

लोग इनको लूटने के लिए इधर-उधर भागने लगे। वह हर चीज वे लूट लेना चाहते थे, जो कभी या अभी बेशकीमती रही हो, जो उपयोगी हो सकती हो। यह क्या है और वह? कोई तो जानता होगा कि ये चीजें कभी रईसों के पास रही होंगी। लेकिन अब तो मेरी है। अगर तुम इस पर झपटा नहीं मारोगे, तो क्या, कोई और इसे हड़प जाएगा। पांव फिसलने लगे, समुद्री शैवाल पर ये टिक नहीं रहे थे और आगे दलदली रेतीली जमीन में धंसते जा रहे थे। भागते लोगों से समुद्री झाड़ियां लिपटने लगीं और वे गिरते-गिराते नीचे आने लगे। किसी ने यह ध्यान नहीं दिया कि वहां एक भी मछली नहीं है। पानी के साथ वह भी चली गई। राजनीतिक विद्रोह के दौरान दुकानें लूटने की घटना आम है, लेकिन इस लूट का कोई मुकाबला नहीं था। इस पाश्विक उन्माद ने मर्द, औरत व उनके बच्चों में इतनी शक्ति भर दी कि वे कीचड़ और रेत से वे सारी चीजें निकालने लगे, जिनके बारे में जानते भी नहीं थे कि चाहिए या नहीं।

उनकी लड़खड़ाती, मगर तेज चाल अचानक मिले इस मौके का दोहन करना चाहती थी। यह ईश्वरीय शक्ति की लूट थी, जिसके सामने कुछ समय पहले यही लोग बेबस थे। लूटो, लूटो; इस सनक में वे अपने जान-माल के नुकसान को भूल गए। उनका एक-दूसरे पर चीखना-चिल्लाना सन्नाटे को चीर चुका था। सबकी आवाजें एक साथ मिलकर समुद्री चिड़ियां की चीं-चीं बन गईं, जो वहां थी ही नहीं। इस शोरगुल में वे उस आंधी-तूफान की दस्तक भी नहीं सुन पाए, जो समुद्र की तरफ से आ रहा था। और समुद्र वापस आया, सबको अपने आगोश में ले लिया। इस तरह से उसकी तलछटी में और बहुत कुछ जुड़ गया।

यही सबको मालूम हुआ; उस टेलीविजन कवरेज से, जिसके पास दिखाने के लिए कुछ भी नहीं था, सिवाय रेतीली जमीन के। उन रेडियो इंटरव्यू से भी कुछ खास पता नहीं चला, जिसमें वैसे लोगों की आवाजें कैद थीं, जो डर, कमजोरी या समझदारी के चलते पहाड़ी से नीचे नहीं उतरे थे। और अखबारों में उन लाशों की ही चर्चा थी, जिनको किसी कारण समुद्र ने किनारे फेंक दिया था। लेकिन लेखक को वह भी मालूम है, जो बाकी किसी को नहीं पता। दरअसल, उसकी कल्पनाओं ने कुलांचें भरीं।

अब इसे सुनिए। उनमें एक शख्स था, जिसे पूरी जिंदगी एक चीज की तलाश रही। उसके पास बहुत कुछ था, कई चीजों पर उसकी नजरें बहुत बार जातीं। जो उसे पसंद था, उसमें से कुछ पर वह जान-बूझकर ध्यान नहीं डालता। असल में, उसे वे चीजें खरीदनी नहीं थीं, पर अब वह उनको हटा नहीं सकता। उसके पास एक नक्काशीदार टेबल लैंप थी, जिसकी रोशनी में वह पढ़ा करता। उसके सिरहाने के पीछे जापानी पेंटर हुकुसाई की पेंटिंग ‘द ग्रेट वेव’ टंगी थी। वास्तव में, वह पूरब के सामान को इकट्ठा नहीं करता था, लेकिन यह पेंटिंग वर्षों से उसके सिरहाने की ओर टंगी थी, इसलिए उसके घर की सजावट का यह हिस्सा नहीं ही थी। बाकी सारी चीजें सजावटी थीं, पर यह नहीं।

वह रिटायर्ड और तलाकशुदा था। पहाड़ी पर उसका बड़ा बंगला था, जिसके पीछे से शहर शुरू होता। गांव से एक औरत आती और उसके घर की साफ-सफाई करती और उसके लिए खाना बनाती थी। इसके अलावा, किसी से उसका साबका न था। भगवान की दया से उसकी जिंदगी में कोई हलचल नहीं थी। उसके जीवन में विघ्न-बाधाएं बहुतेरी आईं और अब वह इन सबसे मुक्त था। लेकिन वह भी उस भीड़ का हिस्सा बन गया, जो समुद्र की तलछटी की ओर भागी थी।

अन्य लुटेरों की तरह, वह एक सामान से दूसरे सामान की तरफ भाग रहा था, जबकि वह उन लुटेरों जैसा नहीं दिखता। कभी वह चीनी मिट्टी के सामान पलटता, तो कभी उन कलाकृतियों को टटोलता, जो बेकार हो चुकी थीं। शराब की बोतलें, पुरानी मोटरसाइकिल, दंत-चिकित्सक की कुरसी, इन सब पर उसकी नजरें पड़ीं। पसली और पैर की हड्डियों को भी उसने देखा, पर पहचान न पाया। उसने तब तक कुछ नहीं उठाया, जब तक कि उसकी नजर नारंगी-भूरे शैवाल में उलझी एक चीज पर नहीं पड़ी। वह मोती-मूंगे से जड़ित आईना था। उसका यह उठा लेना असंभव लगा, पर सच यही था। वह जानता था कि वह कहां है, समुद्र द्वारा छोड़े गए मैदानी हिस्से में है। लेकिन वह नहीं जानता था कि उसने क्या उठाया।

इससे पहले यह चीज उसे कभी नहीं मिली। लेकिन इसके उपयोग का पता उसी घटना से चला, जो पहले कभी घटित नहीं हुई। वह घटना थी, रिक्टर स्केल पर मापी गई सबसे बड़ी तीव्रता वाले भूकंप का आना। वह उस आईने को लेकर बढ़ा, उसके पीछे एकमात्र चमकीला दृश्य पानी का था, जो तेज प्रवाह के साथ आ रहा था। वह आदमी अपने काम की आखिरी वस्तु लेकर लौटता रहा। और वह प्रलयकारी लहर उसके पीछे (सिर की तरफ से) आई और उसे बहा ले गई।

उसका नाम राजधानी के शासक-गलियारों में जाना-पहचाना था, पर बचे लोगों में अब उसका नाम न था। उसके साथ कई समुद्री डाकुओं व मछुआरों का पता नहीं चल पाया और उनकी भी खोज-खबर छिपी रह गई, जिन्हें तानाशाही हुकूमत ने विमान से समुद्र में फेंक दिया। आखिर उस दिन कौन उनको ढूंढ़ता कि वे कहां हैं? किसी ने गुलदस्ते या फूल तो चढ़ाए नहीं थे। वे अतल गहराई में डूब चुके थे।
(अनुवाद: प्रवीण प्रभाकर)

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