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इंटरनेट बढ़ा सकता है डिप्रेशन की बीमारी

मित्रो, यदि आप इंटरनेट से दूर बने रहने पर तनाव महसूस करते हैं या ऑनलाइन न रह पाने की सूरत में अपना ब्लड प्रेशर बढ़ता हुआ लगता है तो यकीन जानिए कि आपको एक खास दिमाग़ी बीमारी घेर रही है जिसे दुनिया भर में डिसकोमगूगोलेशन के नाम से जाना जाता है।

विदेशों में चर्चित इस बीमारी का असर अपने देश में भी पांव पसार रहा है और कश्मीर से कन्याकुमारी तक ऐसी शिकायतें लगातार मिल रही हैं कि आजकल नेट यूजर टीनएजर्स में मानसिक तनाव आत्महत्या कर लेने की हद तक बढ़ रहा है। इसमें इंटरनेट का ज्यादा इस्तेमाल ही उन्हें आत्मघात करने के लिए उकसाने वाले बुरे साथी की भूमिका भी निभा रहा है। इसलिए चौकस रहें और इंटरनेट को अपने लिए जानलेवा लत तो कतई न बनने दें।

उद्धव अपनी कक्षा का होनहार छात्र था। मुंबई के मैनेजमेंट छात्र 20 वर्षीय उद्धव सिजोफ्रेनिया की बीमारी से पीड़ित था। उसने एक बार अपनी काउंसलर से कहा था कि वह खुद को खत्म करना चाहता है। मनोचिकित्सक से उन्होंने ये भी कहा कि वह खुद की जिंदगी समाप्त करने के लिए वेबसाइट का सहारा ले रहा है। एक दिन जब उनके पिता-माता घर से बाहर गए हुए थे, तब उद्धव ने अपनी जीवनलीला का अंत कर दिया। उद्धव की मौत के एक साल के बाद मौजूदा समय में मुंबई में आत्महत्या के तमाम मामले सामने आए हैं।

आज के दौर में उद्धव सरीखे कई युवा इंटरनेट को अपना परम मित्र मान रहे हैं। वह अपनी दु:ख-तकलीफों के लिए इंटरनेट का सहारा जमकर लेते हैं। और हां, इंटरनेट से उन्हें हर तरह की सलाह मिल भी जाती है। यहां तक कि ऐसी सलाह कि आप अपनी जिंदगी समाप्त कैसे करें। भले ही देर-सवेर वह सलाह उनके लिए कितनी भी खतरनाक साबित क्यों न हो। इंटरनेट पर अगर आप गूगल में जाकर सर्च करेंगे कि ‘वेज़ टू कमिट सुइसाइड’ तो आपको लाखों ऐसी साइटें मिल जाएगी जिसमें आत्महत्या के अलग-अलग तरीके लिखे मिलेंगे। 

इसमें से कई साइटों में वीडियो भी हैं जिसमें आत्महत्या के वीडियो दिए गए हैं। यही नहीं, कुछ साइटें तो आपको ये तक जानकारी दे रही हैं कि कैसे अपनी मौत को एक हादसा बनाया जाए। इन साइटों के लिंक ‘हिन्दुस्तान’ जानबूझकर नहीं दे रहा है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि कई युवा आमतौर पर ऐसे युवाओं के ब्लॉग पढ़ते हैं जो निराश और हताश होते हैं और जो उन्हें अपनी जीवनलीला समाप्त करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि युवा साइबरवर्ल्ड में बेहतर तरीके से नेविगेट कर पाते हैं और उन्हें अजनबियों से बातचीत करने में किसी तरह की हिचकिचाहट भी नहीं होती।

मनोचिकित्सकों का कहना है कि कई बार युवा दवाइयों की सलाह भी इंटरनेट से लेते हैं और अपनी दवा की खुराक की मात्र कम या ज्यादा कर लेते हैं। इसके अलावा नेट पर सेक्स चैट भी कई बार युवाओं को मानसिक अवसाद की अवस्था में पहुंचा देती है। मनोचिकित्सक कहते हैं कि कई मामलों में माता-पिता इन लक्षणों को दरकिनार कर देते हैं। चूंकि आज के दौर में पैरेंट्स और बच्चों के बीच कम्युनिकेशन भी बहुत ज्यादा नहीं है। ऐसे में कई बार तो ये समस्याएं बहुत देर में सामने आती हैं।

डिसकोमगूगोलेशन : इंटरनेट के प्रति दीवानगी
आज के दौर में इंटरनेट लोगों की जरूरत बन गया है। इसके बिना कई लोगों को ऐसा लगता है कि जिंदगी जैसी अधूरी हो गई है। किसी कारणवश ऑनलाइन न हो पाना कई लोगों को हताश कर देता है। अगर आपको भी ऑनलाइन न हो पाने के कारण हताशा होती है, तो यह परेशानी की बात हो सकती है। एक अध्ययन के मुताबिक ऑनलाइन न होने के कारण स्ट्रेस अनुभव करने वाले लोग डिसकोमगूगोलेशन की समस्या से पीड़ित हो सकते हैं।

ब्रॉडबैंड के बढ़ते प्रसार ने हमें इंस्टेंट आंसर की दुनिया में पहुंचा दिया है जहां सूचनाएं लोगों से एक माउस क्लिक दूर हैं। इनकी वजह से लोग वेब के आदी हो गए हैं। वेब उनके सारे सवालों का जवाब और उनके अकेलेपन का साथी बन चुका है।  ऐसे में जब वो ऑनलाइन एक्सेस नहीं कर पाते, तो इसी छटपटाहट में वह धीरे-धीरे डिसकोमगूगोलेशन के शिकार होते चले जाते हैं। यह शब्द ‘डिसकोमबोबुलेट’ और ‘गूगल’ से मिलकर बनाया गया है। डिसकोमबोबुलेट का मतलब हताशा या असमंजस होता है।

लत इंटरनेट की
विशेषज्ञों के अनुसार इंटरनेट एडिक्शन को अन्य परंपरागत लतों के समान चार तथ्यों पर परखा जा सकता है। जैसे अधिक इस्तेमाल, दूसरी प्रमुख भावनाओं को नजरअंदाज करना, अधैर्यता और नकारात्मक प्रतिघात के रूप में देखने को मिल रहा है। विभिन्न शोधों के अनुसार अधिक समय तक इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों को अक्सर यह पता नहीं चलता कि वह कितना लंबा समय इंटरनेट पर बिता चुके हैं। साथ ही वह कई आधारभूत मानवीय इच्छाओं को नजरअंदाज करने लगते हैं। यहां तक कि वह कई बार खाना और लंबे समय तक यूरीनेट की प्रक्रिया को भी रोके रखते हैं। जब-जब इंटरनेट कनेक्टिविटी लो होती है, तब उनमें गुस्सा, निराशा और तनाव जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं।

ये  हो जाती है दिक्कतें
इंटरनेट एडिक्शन डिस्ऑर्डर्ड लोगों को कई अन्य मानसिक परेशानियों से ग्रसित भी देखा गया। विशेष तौर पर इंटरनेट ओवरयूज के साथ व्यग्रता, असंयम और अभद्र शब्द अधिक प्रयोग करना आदि लक्षण अधिक देखने को मिले हैं।

इतना ही नहीं, इंटरनेट के ओवर यूज का आलम यह है कि कई लोगों में इसके लक्षण लत के समान पाए गए हैं। आंखों का कमजोर होना, ई-मेल ओवरलोड, निजी जीवन में घुसपैठ व अश्लीलता आदि मामले तो अलग ही हैं। इंटरनेट से यह भावना प्रबल होती है कि आप दुनियाभर से जुड़े हैं और एक अज्ञात शक्ति से आपका संबंध है। कभी-कभी यह मनुष्यों की दूसरों से गहरे संबंध बनाने की अनन्य इच्छा और अपने में परिवर्तन लाने के मार्ग के रूप में भी प्रतीत होता है। लेकिन इंटरनेट इन दोनों मानवीय इच्छाओं को झुठला देता है। यह छद्म संबंध कभी संतुष्टि नहीं देते और वह अज्ञात शक्ति आपकी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरती।

विशेषज्ञों का यहां तक मानना है कि इंटरनेट का अधिक इस्तेमाल लोगों को सामाजिक संबंधों से दूर कर रहा है। वर्चुअल वर्ल्ड की अधिकता उन्हें वास्तविक जीवन की सच्चाइयों से दूर कर रही है। सामान्य कार्यशील वातावरण के लोगों से संपर्क कम हो रहा है। सामाजिक अलगाव और कार्यकुशलता पर नकारात्मक असर देखने को मिल जाता है।

दुनिया भर में बढ़ रही है युवाओं में समस्या
दुनियाभर में इंटरनेट यूज करने वाले युवाओं में सबसे अधिक 18 से 24 आयुवर्ग के लोग हैं। चीन में हुए एक अध्ययन के अनुसार इंटरनेट यूजर्स औसतन एक सप्ताह में 16.9 घंटे ऑनलाइन व्यतीत करते हैं। इस आयुवर्ग में यह औसत समय सीमा 21 घंटे पाई गई है। वर्ष 2006 में हुए एक अध्ययन के अनुसार लगभग दो लाख दस हजार दक्षिण कोरियाई बच्चे यानी लगभग 2.1 प्रतिशत बच्चों में इंटरनेट एडिक्शन जैसे लक्षण देखने को मिले और 80 प्रतिशत में उपचार की आवश्यकता भी देखने को मिली, जिसके तहत साइकोट्रोपिक मेडिकेशन भी शामिल है।

मनोचिकित्सकों में जारी है बहस
हालांकि विशेषज्ञों के बीच यह बहस का मुद्दा है कि इंटरनेट ओवरयूज को लत माना जाए जो ऑनलाइन अधिक समय बिताने वालों की निजी और प्रोफेशनल जीवन को नुकसान पहुंचाती है या फिर साइकलोजिकल डिसॉर्डर। कई विशेषज्ञों का यहां तक भी मानना है कि इंटरनेट एक मानसिक बीमारी भी है जो सिजोफ्रनिया से ऊपर की हो सकती है।

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में किए गए एक अध्ययन के अनुसार इंटरनेट ओवर यूज करने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि वह वास्तविक जगत में रहते हैं, वर्चुअल वर्ल्ड में नहीं, जहां वास्तविक लोग और उनसे जुड़ी वास्तविक जिम्मेदारियों का उन्हें वहन करना होता है। बहस के दौरान अमेरिकन साइकाइट्रिक एसोसिएशन के अनुसार इंटरनेट ओवर यूज को लत के तौर पर देखना चाहिए और उसका उसी प्रकार उपचार करना चाहिए।

इंटरनेट आपकी कमजोरी न बने और इसका इस्तेमाल अन्य रचनात्मक कार्यो की जगह न बना ले, इस पर ध्यान देना जरूरी है। आपका काम ही आपकी पहचान बनता है और रचनात्मक कार्य पूरी तरह से किसी भी व्यक्ति की निजी मेहनत का नतीजा होता है। लिहाजा, इंटरनेट इस्तेमाल करने के संबंध में कुछ स्वनिर्धारित नियम काम में लाए जा सकते हैं।

गौर करें 
- इंटरनेट पर पूरी तरह से निर्भरता न बनाएं। जिससे उसका इस्तेमाल न कर पाने के कारण आप हताशा के शिकार नहीं होगें। 
- किसी नियमित समय पर रोज इंटरनेट न करें। 
- ऑनलाइन होने के दौरान बीच-बीच में ब्रेक लेते रहें ताकि अनावश्यक दबाव से बचा जा सके।

क्या है डिसकोमगूगोलेशन
मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक डिसकोमगूगोलेशन एक तरह का एहसास है, जब कोई व्यक्ति जो सूचनाओं के संसार यानी इंटरनेट को एक्सेस नहीं कर पाता है। यह दिमाग की गतिविधि होती है। यह एक नए तरह का सिंड्रोम है जो किसी समस्या का तुरंत उत्तर न ढूंढ पाने और इंटरनेट पास न होने के कारण किसी समस्या का समाधान न हो पाने के कारण होता है। वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में पाया कि यह मीटिंग में देर से पहुंचने, किसी महत्वपूर्ण एग्जाम को देने के समय होने वाले तनाव के बराबर होता है। इस सर्वे को वैज्ञानिकों ने 2000 लोगों के ऊपर किया।

वैज्ञानिकों के दल ने जब लोगों के हृदय और दिमाग को मॉनिटर के द्वारा नापा गया तो उन्होंने पाया कि पुरुष की बेचैनी महिलाओं की तुलना में ज्यादा थी। उन्होंने देखा कि नेट न कर पाने के कारण पुरुषों में स्ट्रेस की समस्या ज्यादा होती है। सर्वे में यह भी देखा गया कि इंटरनेट कनेक्शन काट देने के बाद लोगों के दिमाग और ब्लड प्रेशर में एकदम से तेजी गई।

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