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9 जुलाई: प्रदोष व्रत

त्रयोदशी तिथि में सायं काल को प्रदोष कहा जाता है। प्रदोष के समय महादेवजी कैलास पर्वत के रजत भवन में नृत्य करते हैं और देवता उनके गुणों का स्तवन करते हैं। अत: धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष की इच्छा रखने वाले पुरुषों को प्रदोष में नियमपूर्वक भगवान शिव जी की पूजा हवन तथा उनका गुण गान करने चाहिए। 

द्ररिद्रता के तिमिर से अन्धे और भव सागर में डूबे हुए संसार भय से मनुष्यों के लिए यह प्रदोष व्रत पार लगाने वाली नौका है। भगवान शिवजी की पूजा करने से मनुष्य दरिद्रता, मृत्यु, दु:ख और पर्वत के समान भारी ऋण भार को शीघ्र ही दूर करके सम्पत्तियों से पूजित होता है।

व्रती इस दिन निराहर रहे, सूर्यास्त से तीन घड़ी पहले स्नान करे। उपरान्त श्वेत वस्त्र धारण करके धीर पुरुष संध्या के समय तथा जप आदि नित्यकर्म की विधि पूरी करके मौन हो शास्त्र विधि का पालन करते हुए भगवान शिव जी की पूजा आरम्भ करे।

पूजा में यज्ञोपवीत, वस्त्र और आभूषण अर्पण करें। परम पवित्र अष्टांग युक्त चंदन, चड़ावे। बिल्व, मदार, लाल कमल, धरूता, कनेर, चमेली, कुशा, अपामार्ग, तुलसी, जूही, चम्पा तथा करवीर के फूलों में से जितने मिल जाएं, उन सबको शिवोपसाक भगवान शिव पर चढावें। इनके अतिरिक्त भी नाना प्रकार के सुगन्धित पुष्प निवेदन करें।

तत्पश्चात लाल चंदन से उत्पन्न धूप और निर्मल दीप समर्पित करें। उसके बाद हाथ धोकर घी, नमकान और साग, मिठाई, पूआ, शक्कर तथा गुड़ के बने हुए पदार्थ एवं खीर का नैवैद्य का भोग लगावे। मधु, दही और जल भी अर्पण करें। इस खीर का हवन करे। भगवान को नैवेद्य देकर मुख शुद्ध के लिए उत्तम ताम्बूल अर्पण करें।
धूप से आरती करें। यदि यह सब करने की अपने में शक्ति न हो तो अधिक धन का अभाव हो, तो अपने पास जितना धन हो, उसी के अनुसार ही पूजा करें। अन्त में उद्यापन करके इसका विसजर्न करें।

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