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बढ़े कदम पा लेंगे मंजिल

पहला देशी क्रायोजेनिक फ्लाइट टेस्ट नाकाम होने की घटना ने भले ही भारत की उम्मीदों को कुछ समय के लिए झटका दे दिया है, लेकिन 18 वर्षो की इस जी-तोड़ मेहनत को ‘जाया होना’ कहना सही नहीं होगा। कम से कम आज हम ये तो कह ही सकते हैं कि क्रायोजेनिक तकनीक हमारे मुल्क के पास भी है और इसमें कोई शक नहीं है आने वाले समय में स्पेस की दुनिया में भारत का परचम लहराएगा जरूर।

भारत के पहले स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन का फ्लाइट टेस्ट नाकाम हो गया। इससे भारत का उन पांच देशों की कतार में शामिल होने का सपना फिलहाल तो टूट ही गया, जिन्होंने जटिल क्रायोजेनिक तकनीक में महारत हासिल की है। गौर करने वाली बात ये है कि इसरो इस तकनीक पर पिछले 18 साल से काम कर रहा है। जिस रॉकेट में इस इंजन का प्रयोग हुआ दुर्भाग्यवश वह उड़ान के 505 सेकेंड बाद ही रास्ते से भटक कर सागर में जा समाया। 
जीएसएलवी 
जीएसएलवी ऐसा मल्टीस्टेज रॉकेट होता है जो दो टन से अधिक वजनी उपग्रह को पृथ्वी से 36,000 कि.मी. की ऊंचाई पर भू-स्थिर कक्षा में स्थापित कर देता है जो विषुवत वृत्त या भूमध्य रेखा की सीध में होता है। ये रॉकेट अपना कार्य तीन चरण में पूरा करते हैं। इनके तीसरे यानी अंतिम चरण में सबसे अधिक बल की जरूरत पड़ती है। रॉकेट की यह जरूरत केवल क्रायोजेनिक इंजन ही पूरा कर सकते हैं। इसलिए बगैर क्रायोजेनिक इंजन के जीएसएलवी रॉकेट का निर्माण मुश्किल होता है।
क्या है जीएसएलवी की खासियत
दो टन से अधिक वजनी उपग्रह ही हमारे लिए ज्यादा काम के होते हैं इसलिए दुनिया भर में छोड़े जाने वाले 50 प्रतिशत उपग्रह इसी वर्ग में आते हैं। जीएसएलवी रॉकेट इस भार वर्ग के दो तीन उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में ले जाकर 36,000 कि.मी. की ऊंचाई पर भू-स्थिर कक्षा में स्थापित कर देता है। यही जीएसएलवी रॉकेट की प्रमुख विशेषता है।
क्रायोजेनिक्स 
अत्यधिक निम्न ताप उत्पन्न करने का विज्ञान क्रायोजेनिक्स कहलाता है। दरअसल क्रायोजेनिक एक ग्रीक शब्द क्रायोस से बना है जिसका अर्थ होता है शीत यानी बर्फ की तरह शीतल। जीरो डिग्री सेंटीग्रेड से 253 डिग्री नीचे के तापमान को क्रायोजेनिक कहते हैं। इस निम्न तापमान का उपयोग करने वाली प्रक्रियाओं और उपायों का क्रायोजेनिक इंजीनियरिंग के अंतर्गत अध्ययन किया जाता है। जी.एस.एल.वी. रॉकेट में प्रयुक्त होने वाली द्रव ईंधन चालित इंजन में ईंधन बहुत कम तापमान पर भरा जाता है, इसलिए ऐसे इंजन क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन कहलाते हैं। इस तरह के रॉकेट इंजन में अत्यधिक ठंडी और द्रवीकृत गैसों को ईंधन और ऑक्सीकारक के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस इंजन में हाइड्रोजन और ईंधन क्रमश: ईंधन और ऑक्सीकारक का काम करते हैं। सॉलिड फ्यूल से यह कई गुना ताकतवर होते हैं और रॉकेट को बूस्ट देते हैं। लंबी दूरी और भारी रॉकेटों के लिए यह तकनीक जरूरी है। 
क्रायोजेनिक इंजन की तकनीक कहां-कहां 
क्रायोजेनिक तकनीक का पहली बार इस्तेमाल करीब पांच दशक पहले अमेरिका के एटलस सटूर नामक रॉकेट में सबसे पहले हुआ था। तब से अब तक क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन प्रौद्योगिकी में काफी सुधार हुआ है। अमेरिकी क्रायोजेनिक इंजनों में आर.एल. 10 नामक क्रायोजेनिक इंजन विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जी.एस.एल.वी. रॉकेट एरियन में एसएम 7 क्रायोजेनिक इंजन लगाया जाता है। जापान द्वारा विकसित क्रायोजेनिक इंजन का नाम एल ई 5 है।
पहले रूस से थी मदद
पहले भारत को रूस से यह तकनीक मिल रही थी। 1998 में पोखरण परीक्षण के बाद अमेरिका ने भारत पर पाबंदी लगा दी और रूस का रास्ता बंद हो गया। वैसे भारत उससे पहले इस तकनीक पर काम कर रहा था। 
काश ! न होता विफल
गत 18 वर्षो से वैज्ञानिक कड़ी मेहनत द्वारा इस तकनीक को विकसित करने में लगे हैं। परीक्षण सफल होने पर भारत दो टन से अधिक के सेटेलाइट लांच करने और उन्हें पृथ्वी से 36,000 कि.मी. ऊपर की ओर कक्षा में ले जाने में सक्षम हो जाता। 330 करोड़ रुपए के इस मिशन का नाकाम होना देश के स्पेस प्रोग्राम के लिए बड़ा झटका है। एक साल में फ्लाइट टेस्ट को फिर से अंजाम दिया जाएगा। इस प्रोग्राम की विफलता के साथ भारत को एक बड़ा धक्का गगन को लेकर लगा है। गगन, जीपीएस की तर्ज पर तैयार एक रीजनल पोजिशनिंग सिस्टम है। दुनिया के सिर्फ पांच देशों अमेरिका, रूस, चीन, जापान और फ्रांस के पास यह तकनीक है।
पूरी तरह फेल नहीं है मिशन
हालांकि उड़ान के पांच मिनट बाद ही जीएसएलवी डी-3 रॉकेट समुद्र में गिर गया। अपनी राह से भटकते हुए यह रॉकेट 2200 किलो के कम्युनिकेशन सेटेलाइट समेत बंगाल की खाड़ी में गिर पड़ा, लेकिन फिर भी इस अभियान से इसरो ने कई सबक सीखे हैं। इंस्टीटय़ूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस के रिसर्च फेलो अजय लेले कहते हैं कि इस अभियान में बहुत बड़ी चूक नहीं हुई है। इसरो ने इस अभियान से कई सबक लिए हैं। जल्द ही हम उस कतार में शामिल हो जाएंगे जिनके पास क्रायोजेनिक तकनीक है। वहीं इसरो के चेयरमैन के. राधाकृष्णन का कहना है कि वैज्ञानिक साल भर के अंदर ही क्रायोजेनिक तकनीक वाले इंजन से जीएसएलवी को फिर टेस्ट करेंगे। इसरो ने बहुत कम तापमान को आसानी से झेल सकने वाली मिश्रधातु विकसित कर ली है। इसके अलावा, मिश्र धातु से बनने वाले क्रायोजेनिक इंजन के लिए खास वेल्डिंग तकनीक और नया लुब्रीकेंट्स की भी ईजाद कर लिया गया है। इसरो प्रमुख ने कहा है कि इसकी वजह से 2013 में प्रस्तावित चंद्रयान-2 पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। इसके अलावा भविष्य में लांच की जाने वाली कम्युनिकेशन सेटेलाइट की योजना पर भी असर नहीं पड़ेगा।

कैसी-कैसी मुश्किलें आती हैं क्रायोजेनिक इंजन में
तापमान : क्रायोजेनिक इंजन के थ्रस्ट में तापमान बहुत ऊंचा (2000 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक) होता है। अत: ऐसे में सर्वाधिक प्राथमिक कार्य अत्यंत विपरीत तापमानों पर इंजन व्यवस्था बनाए रखने की क्षमता अर्जित करना है। क्रायोजेनिक इंजनों में -253 डिग्री सेंटीग्रेड से लेकर 2000 डिग्री सेंटीग्रेड तक का उतार-चढ़ाव होता है, इसलिए थ्रस्ट चैंबरों, टरबाइनों और ईंधन के सिलेंडरों के लिए कुछ विशेष प्रकार की मिश्रधातु की जरूरत होती है। इसरो ने बहुत कम तापमान को आसानी से झेल सकने वाली मिश्रधातु विकसित कर ली है।
प्रणोदक: अन्य द्रव प्रणोदकों की तुलना में क्रायोजेनिक द्रव प्रणोदकों के साथ कठिनाई यह है कि ये बहुत जल्दी वाष्प बन जाते हैं। इन्हें अन्य द्रव प्रणोदकों की तरह रॉकेट खंडों में नहीं भरा जा सकता।
दहन कक्ष तक ईंधन और ऑक्सीकारक को पहुंचाने: क्रायोजेनिक इंजन के टरबाइन और पंप जो ईंधन और ऑक्सीकारक दोनों को दहन कक्ष में पहुंचाते हैं, को भी खास किस्म के मिश्रधातु से बनाया जाता है। द्रव हाइड्रोजन और द्रव ऑक्सीजन को दहन कक्ष तक पहुंचाने में जरा सी भी गलती होने पर कई करोड़ रुपए की लागत से बना जीएसएलवी रॉकेट रास्ते में जल सकता है।
अन्य मुश्किलें: दहन के पूर्व गैसों (हाइड्रोजन और ऑक्सीजन) को सही अनुपात में मिश्रित करना, सही समय पर दहन प्रारंभ करना, उनके दबावों को नियंत्रित करना, पूरे तंत्र को गर्म होने से रोकना आदि।

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