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बायपास सजर्री

हृदय रोगों के उपचार में इस्तेमाल की जाने वाली बायपास सर्जरी को लेकर कई शंकाएं मन में रहती हैं। आखिर यह है क्या? डॉक्टरों के मुताबिक हार्ट वाल्व खराब होने, रक्तचाप बढ़ने, हार्ट की मांसपेशी बढ़ने और हार्ट कमजोर होने से हार्ट फेल होता है। अगर समय पर इलाज हो तो बचा जा सकता है।

हृदय की धमनी (कोरोनरी आर्टरी) में रुकावट होने को कोरोनरी आर्टरी डिजीज (सीएडी) कहते हैं। यह रुकावट वसा जमने से होती है, जिससे धमनी कठोर हो जाती है। धमनी के पूर्ण बंद होने में हृदयाघात की आशंका बढ़ जाती हैं। हृदय की तीन मुख्य धमनियों में से किसी भी एक या सभी में अवरोध पैदा हो सकता है। ऐसे में ऑपरेशन में शरीर के किसी भाग से नस निकालकर उसे हृदय की धमनी से जोड़ दिया जाता है। यह नई जोड़ी हुई नस धमनी में रक्त प्रवाह पुन: चालू कर देती है। 

छाती के अंदर से मेमेरी आर्टरी या फिर हाथ से रेडिअल आर्टरी या पैर से सफेनस वेन निकालकर हृदय की धमनी से जोड़ी जाती है। कई लोगों को लगता है कि बीमार धमनियों को निकालकर नई नसें लगा दी जाती हैं, यह धारणा गलत है। बीमार धमनियों को निकाला नहीं जाता बल्कि उसी धमनी में ब्लाक या रुकावट के आगे नई नस जोड़ दी जाती है, इसी से रक्त प्रवाह पुन: कायम होता है। आर्टरी ब्लाकेज के मामले में बायपास सर्जरी सर्वश्रेष्ठ विकल्प है। 

शुरू में बायपास सर्जरी धड़कन रोक कर किया जाता था। इससे दूसरे अंगों किडनी, लीवर, फेफड़ा आदि पर विपरीत प्रभाव पड़ता था। अब नई विधि बीटिंग हार्ट सर्जरी से हृदय उस स्थान को रोका जाता है जहां सर्जरी होनी है। पूर्व विधि में हार्ट की सर्जरी में सात-आठ बोतल रक्त की चाहिए होती थी, जबकि बीटिंग हार्ट सर्जरी में एक से दो बोतल रक्त काफी रहता है। मरीज को सात दिनों में अस्पताल से छुट्टी भी मिल जाती है। बायपास सर्जरी की नई तकनीक में बीटिंग हार्ट सर्जरी सफल है। इससे मरीजों को परेशानी कम होती है, वहीं सात दिनों में उन्हें अस्पताल से छुट्टी भी मिल जाती है।

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