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24 नवंबर, 2020|11:49|IST

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डीएनए फिंगरप्रिंटिंग

डीएनए फिंगरप्रिंटिंग तकनीक का उपयोग आपराधिक मामलों की गुत्थियां सुलझाने के लिए किया जाता है। इसके साथ ही मातृत्व, पितृत्व या व्यक्तिगत पहचान को निर्धारित करने के लिए इसका प्रयोग होता है। वर्तमान में पहचान ढूंढने के तरीकों में फिंगरप्रिंटिंग सबसे बेहतर मानी जाती है। जीव जंतुओं, मनुष्यों  में विशेष संरचनायुक्त वह रसायन जो उसे विशिष्ट पहचान प्रदान करता है, उसे डीएनए (डाई राइबो न्यूक्लिक एसिड) कहते हैं।

शरीर में मौजूद खरबों कोशिकाओं के क्रियाकलाप डीएनए से तय होते हैं, हालांकि डीएनए कणों का ढांचा हर व्यक्ति में एक समान होता है, लेकिन उन्हें गढ़ने वाले बुनियादी अवयवों का क्रम सभी में समान नहीं होता। एक ही प्रजाति के सदस्यों के बीच पहचान ढूंढने के लिए इस अंतर का उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया को जेनेटिक फिंगरप्रिंटिंग और डीएनए प्रोफाइलिंग भी कहा जाता है। 1984 में ब्रिटिश लीसेस्टर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक सर एलेक जेफ्रेज ने इसका विकास किया।

इस पद्धति में किसी व्यक्ति के जैविक अंशो जैसे-रूधिर, बाल, लार, वीर्य या दूसरे कोशिका-स्नोतों के सहारे उसके डीएनए की पहचान की जाती है। डीएनए फिंगरप्रिंट स्पेसिफिक डीएनए क्रम का इस्तेमाल करता है, जिसे माइक्रोसेटेलाइट कहा जाता है। माइक्रोसेटेलाइट डीएनए के छोटे टुकड़े होते हैं। शरीर के कुछ हिस्सों में इनकी संख्या अलग-अलग होती है। 

फोरेंसिक विज्ञान में डीएनए फिंगरप्रिंट का खासा उपयोग होता है। साथ ही फोरेंसिक जांच के लिए वास्तविक फिंगरप्रिंट की जरूरत नहीं पड़ती। इसकी मदद से अपराधी को महज एक बूंद के आधार पर ही पकड़ा जा सकता है। डीएनए सैंपल को लिए गए डीएनए एंजाइम द्वारा सेंगमेंटाइज्ड किया जाता है। इसके बाद इसकी छानबीन करके इसे एक्सरेफिल्म पर एक्सपोज किया जाता है जहां वह ब्लैक बार बनाते हैं, जिन्हें डीएनए फिंगरप्रिंट कहते हैं।

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  • Web Title:डीएनए फिंगरप्रिंटिंग