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सोलर विंड

सोलर विंड सूर्य से बाहर आने वाले कणों को कहा जाता है। यह कण अंतरिक्ष में चारों दिशाओं में फैलते हैं। यह मुख्यत: प्रोटोन्स और इलेक्ट्रोन्स (प्लाजमा) से बने होते हैं जिनकी ऊर्जा करीब एक केईवी (किलो-इलेक्ट्रोन वॉल्ट) होती है। इसके बावजूद सोलर विंड आमतौर पर ज्यादा घातक नहीं होती। यह करीब 100 एयू(एस्ट्रोनॉमिकल यूनिट्स, पृथ्वी-सूर्य के बीच की दूरी) जितनी दूरी तक पहुंचती हैं। यह दूरी सूर्य से वरुण ग्रह जितनी है जहां जाकर यह इंटरस्टेलर मीडियम से टकराती हैं। जिन स्थानों सोलर विंड गहरी होती है, उस स्थान को हीलियोस्फियर कहा जाता है।

सोलर विंड के सूर्य से छिटकने का एक कारण कोरोना का तीव्र तापमान है, जो सूर्य की सबसे बड़ी परत है। कोरोना का तीव्र तापमान अभी तक भौतिक विज्ञान का अनुत्तरित प्रश्न है। साथ ही जिस रफ्तार से सोलर विंड सूरज से बाहर आती है - 400 से 700 कि.मी. प्रति सेकेंड - अपने में अनुत्तरित है। अनुमान है कि कोरोना के तापमान के अतिरिक्त इन कणों को सूर्य से छिटक कर अंतरिक्ष में जाने के लिए किसी अन्य स्नोत से काइनेटिक एनर्जी मिलती है।
सोलर विंड के अजीबोगरीब दृश्यों में ऑरोरे (उत्तरी रोशनी और दक्षिणी रोशनी), जियोमेग्नेटिक स्टॉर्म्स हैं जो कई बार पावर ग्रिडों को नुकसान पहुंचाते हैं और एस्ट्रोनॉट्स को भी इनसे खतरा होता है। सूर्य से प्रति घंटा 6.7 अरब टन सोलर विंड बाहर निकलती है, यह संख्या अंतरिक्ष की अनंत गहराइयों के सामने यह कुछ भी नहीं है। अंतरिक्ष यान वोयाजर प्रथम 23-24 मई 2005 को टर्मिनेशन शॉक तक पहुंच गया था। उससे भेजे गए डाटा से वैज्ञानिकों को यह अंदाजा लगा था कि सोलर विंड स्थानीय अंतरिक्ष वातावरण में ज्यादा बड़ी शक्ति नहीं होती।

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