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मेटल डिटेक्टर

आपने अकसर एयरपोर्ट पर, सिनेमाघरों में, मैट्रो स्टेशनों में सामान की तलाशी करते वक्त मेटल डिटेक्टर का इस्तेमाल होते देखा होगा। ऐसे में आपके मन में प्रश्न जरूर उठता होगा कि आखिर बैग के अंदर से यह इस बात का पता कैसे लगा लेते हैं कि कोई सामान अंदर है या नहीं।

मेटल डिटेक्टर का इस्तेमाल धातु से जुड़े सामानों का पता लगाने में किया जाता है। इसके अलावा लैंड माइंस का पता लगाने, हथियारों का पता लगाने जैसे कई कामों में किया जाता है। मेटल डिटेक्टर में एक दोलक होता है जो अल्टरनेट करंट उत्पन्न करता है जो कुंडली में से प्रवाहित होकर अलग चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है। इसमें एक कुंडली का इस्तेमाल चुंबकीय क्षेत्र को मापने के लिए किया जाता है, चुंबकीय पदार्थ के होने पर चुंबकीय क्षेत्र में होने वाले परिवर्तन के आधार पर इसको मापा जाता है। इसमें लगे माइक्रोप्रोससेर धातु का पता लगाते हैं। मेटल डिटेक्टर वैद्युत चुंबकत्व के सिद्धांत पर काम करते हैं। अलग-अलग कार्यो के इस्तेमाल के लिहाज से मेटल डिटेक्टरों की संवेदनशीलता अलग होती है।
उन्नीसवीं सदी में वैज्ञानिक ऐसे यंत्र की खोज करने में लगे थे जिससे धातुओं को खोजा जा सके। शुरुआत में धातुओं की खोज के लिए जो सिस्टम बनाए गए, उनकी क्षमता सीमित थी और वह ऊर्जा का इस्तेमाल ज्यादा करते थे। ऐसे में वह कारगर साबित नहीं होते थे। 1937 में जेरार्ड फिशर ने ऐसा यंत्र खोजा जिसमें अगर रेडियो किसी मेटल को खोजने में खराब हो जाए तो उसे उसकी रेडियो फ्रिक्वेंसी के आधार पर खोज सकने की क्षमता थी। वह सफल हुए और उन्होंने इसका पेटेंट करवा लिया।

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