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माइटोकॉण्ड्रिया

मानव शरीर करोड़ों कोषों के मेल से बना है। आहार को सुपाच्य और ऊर्जामय बनाने में जीव-कोष के लिए छोटे से भाग की भी भूमिका होती है जो माइटोकॉण्ड्रिया कहलाता है। कोशिका के अंदर माइक्रोस्कोप की सहायता से देखने में ये गोल, लम्बे या अण्डाकार दिखते हैं। वस्तुत: इनका आकार क्षण-क्षण बदलता रहता है। नवीनतम शोध के अनुसार जीवकोष को शक्ति का बड़ा भाग ‘माइटोकॉण्ड्रिया’ से प्राप्त होता है। माइटोकॉण्ड्रिया शरीर के हर जीव कोष में होता है, रक्तकणों को छोड़कर। अत: इसी कारण रक्तकणों को अलग से ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है।
दरअसल, माइटोकॉण्ड्रिया शरीर का पॉवर-हाउस कहलाता है। जीव विज्ञान की प्रशाखा ‘सेल बायोलॉजी’ या ‘साइटोलॉजी’ में इस रहस्य पर से पर्दा उठता है कि माइटोकॉण्ड्रिया से ऊर्जा का निर्माण होता है। अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय के डॉ. सिविया यच. बेन्स ली एवं नार्मण्ड एल. हॉर और ‘रॉकफैलर इन्स्टीटय़ूट फॉर मेडीकल रिसर्च’ के डॉ. अलबर्ट क्लाड ने विभिन्न प्राणियों के जीवकोषों से ‘माइटोकॉण्ड्रिया’ को अलग कर उनका गहन अध्ययन किया है।
माइटोकॉण्ड्रिया की रासायनिक प्रक्रिया से शरीर के लिए पर्याप्त ऊर्जा-शक्ति भी उत्पन्न होती है। संग्रहीत ऊर्जा का रासायनिक स्वरूप एटीपी (एडीनोसिन ट्राइफॉस्फेट) है। शरीर के अंदर जहां अधिक ऊर्जा की जरूरत होती है, वहां अधिक मात्र में माइटोकॉण्ड्रिया पाए जाते हैं। इसके अलावा, जीव कोष का एक घटक होने के साथ-साथ माइटोकॉण्ड्रिया शरीर के अंगों के ऊपर नियंत्रण भी रखता है।
मनोरमा पाण्डेय

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  • Web Title:माइटोकॉण्ड्रिया