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डायलिसिस

डायलिसिस खून साफ करने का डॉक्टरी तरीका है। इस प्रक्रिया को तब अपनाया जाता है जब किडनी सही से काम नहीं कर रही होती है। किडनी से जुड़े रोगों, लंबे समय से डायबिटीज के रोगी, हाई ब्लड प्रेशर जैसी स्थितियों में कई बार डायलसिस की आवश्यकता पड़ती है।

स्वस्थ व्यक्ति में किडनी पानी और खनिज (सोडियम, पोटेशियम, क्लोराइड, फॉस्फोरस, सल्फेट) का सामंजस्य रखा जाता है। डायलसिस परमानेंट और अस्थाई होती है। अगर डायलिसिस के रोगी की किडनी टांसप्लांट होनी है, तो डायलिसिस की प्रक्रिया अस्थाई होती है। अगर रोगी की किडनी इस स्थिति में न हो कि उसे ट्रांसप्लांट किया जाए, तो  डायलिसिस रोजमर्रा हो जाती है।

आमतौर पर दो तरह की डायलिसिस की जाती है, पेरीटोनियल और डायलिसिस। पेरीटोनियल डायलिसिस घर में रोगी द्वारा अकेले या किसी की मदद से की जा सकती है। इसमें ग्लूकोज आधारित सॉल्यूशन एब्डोमेन में तकरीबन दो घंटे तक रहता है, उसके बाद उसे निकाल दिया जाता है। इस प्रक्रिया में सजर्न रोगी के एब्डोमेन के अंदर टाइटेनियम प्लग लगा देता है। यह प्रक्रिया उनके लिए असरदार साबित नहीं होती, जिनका इम्यून सिस्टम सिकुड़ चुका है।

इस प्रक्रिया में डायलिसिस रोजना नहीं करानी पड़ती। यह हीमोडायलिसिस की तुलना में कम प्रभावी होती है। हीमोडायलिसिस आम प्रक्रिया है, ज्यादातर लोग इसी का इस्तेमाल करते हैं। इसमें रोगी के खून को डायलाइजर द्वारा पंप किया जाता है। इसमें खून साफ करने में 3-4 घंटे लगते है। इसे हफ्ते में दो-तीन बार कराना पड़ता है। इसमें मशीन से खून को शुद्ध किया जाता है। 

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