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स्लो फूड

स्लो फूड एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है जिसकी स्थापना 1989 में कालरे पेट्रिनी ने की। ज्यादातर लोग समझते हैं कि स्लो फूड की स्थापना फास्ट फूड के विरोध में हुई, लेकिन वास्तव में संगठन का उद्देश्य काफी व्यापक है। हां, स्लो फूड के सदस्य सिद्धांतत: फास्ट फूड के खिलाफ हैं। स्लो फूड मूलत: तेज औद्योगिकीकरण के कारण मशीनी होते जा रहे जीवन के खिलाफ है क्योंकि यह खानपान की अनूठी परंपराओं और खाद्य पदार्थों की कई किस्मों को खात्मे के कगार पर पहुंचाने के लिए भी जिम्मेदार है।
प्रारंभिक उद्देश्य: स्लो फूड की शुरुआत हुई ऐसे खाद्य पदार्थो के उत्पादन से, जो न केवल अच्छे, स्वच्छ और उचित हों बल्कि बेहतरीन स्वाद वाले और स्वास्थ्यवर्धक भी हों। यही नहीं, उपज के दौरान कार्य स्थिति भी अच्छी रही हो। जैव विविधता भी इसका अहम अभियान है जिसने स्वाद निधि संजोने के इस काम को खाद्य पदार्थो की तमाम अनूठी किस्मों के संरक्षण के प्रयास में तब्दील कर दिया है।
दुनियाभर में स्लो फूड की तमाम इकाइयां हैं जिन्हें कॉनविविया कहते हैं जिनकी नियमित बैठकें होती हैं। टेस्ट एजुकेशन के उद्देश्य से संगठन में कई ऐसे समूह भी हैं जिनका काम स्वाद चखना है। इस कार्यक्रम के तहत कोई भी व्यक्ति उन खाद्य पदार्थो का स्वाद ले सकता है जिनके अनूठे तरह से संरक्षण के लिए स्लो फूड जी-तोड़ मेहनत करता है और यह अनुभव करता है कि वह कैसे भिन्न हैं।
संगठन का काम उत्पादकों व सह-उत्पादकों में संबंध बनाना है। सह-उत्पादक शब्द संगठन की ही ईजाद है, जिसका आशय उन लोगों से है जो अपने समुदाय में सक्रिय हैं और उत्पादकों से संपर्क में रहकर अपने खाद्य पदार्थो के स्नोत के बारे में जानकारी हासिल करते हैं। वे संगठन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में योगदान करने वाले बनते हैं। स्लो फूड खाद्य उत्पादन को कारीगरी मानता है। इसी कारण संगठन को उम्मीद है कि अगर उपभोक्ताओं को इस बारे में जागरूक किया जाए कि खाद्य पदार्थ कहां से आते हैं, तो वह जरूर बदलाव के बारे में सोचेंगे।

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  • Web Title:स्लो फूड