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बायोप्सी

बायोप्सी में जीवों से ली गई किसी कोशिका के जरिए किसी बीमारी का पता लगाया जाता है। इसकी सहायता से बहुत सी बीमारियों के कारणों का पता लगाते हैं। बायोप्सी करने के लिए डॉक्टर कई तरह की विधियां अपनाते हैं।

इसे कराते समय डॉक्टर से उसकी विधि विशेष के बारे में पूछा जा सकता है, जिसके मार्फत वह शरीर से कोशिका नमूना लेता है। रोगी द्वारा परेशानी बताए जाने पर डॉक्टर बायोप्सी से पहले निदान की अन्य विधियां अपनाता है। दरअसल, बायोप्सी की जरूरत जब पड़ती है, जब बीमारी का अन्य विधियों से पता नहीं लगता। इससे पहले रोगी के शरीर का स्कैन आदि भी किया जाता है।

मूलत: बायोप्सी में डॉक्टर रोगी के शरीर से कोशिका अंश ही लेते हैं। जैसे त्वचा परीक्षण में उसका एक सूक्ष्म अंश लेते हैं। आजकल डॉक्टर इंडोस्कोपी की सहायता से भी बायोप्सी का सफल इलाज कर रहे हैं। इंडोस्कोपी भी ऑपरेशन का एक तरीका है, जिसमें शरीर के अंदर कैमरा डाला जाता है, और कैमरे की सहायता से डॉक्टर बीमारी तक पहुंच कर निरीक्षण करता है। उसके बाद उस अंग की बायोप्सी होती है।

बायोप्सी के लिए डॉक्टर शल्य चिकित्सा विधि भी अपनाते हैं, जिससे शरीर के ग्रसित भाग का छोटा सा अंश काट कर प्रशिक्षण को भेजा जाता है। शल्य विधि वाली बायोप्सी से गंभीर बीमारियों के इलाज में काफी मदद मिलती है।

इस विधि से कैंसर के इलाज में भी मदद मिलती है। इससे शरीर के कैंसर ग्रसित अंग से संदिग्ध उभार या धब्बे आदि दूर किए जाते हैं। यह रोग को फैलने से रोकता है। पैथोलॉजिस्ट सेम्पल का निरीक्षण में रोग फैलने की क्षमता पहचानता है। इसमें माइक्रोस्कोप से अन्य लक्षणों की भी जांच होती है। इन निरीक्षणों की पुन: जांच होती है जिसके बाद नतीजे डॉक्टर को भेजे जाते हैं। रोग विस्तार क्षमता की पहचान ‘नैगेटिव’ और ‘पॉजीटिव मार्जिन’ से होती है। पॉजीटिव नतीजे में कोशिका नमूने की जरूरत पड़ती है और नेगेटिव में ऐसी जरूरत नहीं होती।

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