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28 फरवरी, 2020|2:04|IST

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होलोग्राम

होलोग्राम का आविष्कार अंग्रेज-हंगेरीयन भौतिक विज्ञानी डैनिस गैबर ने सन 1947 में किया था। सन् 1960 में इसे और विकसित किया गया। इसके बाद इसे औद्योगिक उपयोग में लाया गया। आपने पुस्तकों के कवर, क्रेडिट कार्ड आदि पर एक छोटी सी चांदी की चौरस चिट चिपकी देखी होगी। इसे होलोग्राम कहते हैं। यह देखने में त्रिबिंब (3-डी) पर असल में द्विबिंब (2-डी) आकृति का होता है। दरअसल, जब दो द्विबिंब आकृतियों को एक दूसरे के ऊपर रखा जाता जाता है तो होलोग्राम बनता है। तकनीकी भाषा में इसे सुपरइंपोजिशन कहते हैं। यह मानव आंख को गहराई का भ्रम भी देता है।
होलोग्राम को लेजर लाइट के माध्यम से बनाया जाता है। लेजर लाइट एक खास वेवलेंथ वाली रोशनी होती है। चूंकि होलोग्राम को सामान्य रोशनी में देखा जाता है, इसलिए ये खास वेवलेंथ वाली लेजर लाइट होलोग्राम को चमकीला बना देती है। होलोग्राम पर पिक्चर प्राप्त करने के लिए दो अलग अलग वेवलेंथ वाली लेजर को एक फोटोग्राफिक प्लेट पर रिकॉर्ड किया जाता है। इससे पहले दोनों लेजर लाइट एक बीम स्प्रैडर से होकर गुजरती हैं, जिससे फ्लैशलाइट की भांति लेजर लाइट प्लेट पर फैल जाती है, और चित्र रिकॉर्ड हो जाता है। इससे एक ही जगह दो इमेज प्राप्त होती हैं। सरल भाषा में इसे समझा जाए तो एक ही आधार पर लेजर रोशनी के माध्यम से दो विभिन्न आकृतियों को इस प्रकार रिकॉर्ड करना, जिससे दर्शक को होलोग्राम को अलग-अलग कोण से देखने पर अलग आकृति दिखे।
मानव आंख जब होलोग्राम को देखती है तो वह दोनों इमेज को मिलाकर मस्तिष्क में संकेत भेजती हैं, जिससे हमें उसके त्रिबिंब (3-डी) होने का भ्रम होता है। होलोग्राम तैयार होने पर उसको पतली चांदी की प्लेटों पर प्रिंट किया जाता है। यह चांदी की प्लेट डिफ्लैक्टेड लाइट से बनाई जाती हैं। चूंकि होलोग्राम की चोरी और नकल काफी जटिल है, इसलिए अपनी सुरक्षा और खुद को अलग करने के लिए तमाम कम्पनियां अपना होलोग्राम इस्तेमाल कर रही हैं।

सारांश जैन