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सज़ा-ए-मौत

26/11 के अभियुक्त अजमल आमिर कसाब को फांसी की सजा सुनाए जाने का देश भर में जहां कई लोगों स्वागत किया है, वहीं फांसी की सजा यानी कैपिटल पनिशमेंट पर विमर्श एक बार फिर से सुर्खियों में है। मृत्युदंड के पक्ष-विपक्ष में अक्सर विचार सुनाई देते रहे हैं, लेकिन कानून में भी अभी तक इसके उन्मूलन पर कानूनविद् एकमत नहीं हैं।

मौजूदा समय में एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार दुनिया के 58 देशों में अभी मृत्युदंड दिया जाता है, जबकि अन्य देशों में या तो इस पर रोक लगा दी गई है, या गत दस वर्षो से किसी को फांसी नहीं दी गई है। गौर करने वाली बात ये है कि जिन अधिकांश देशों में मृत्युदंड का उन्मूलन किया गया है, वह पश्चिमी जगत के देश हैं, जबकि जिन देशों में दुनिया की बहुसंख्य जनता रहती है, वहां मृत्युदंड अभी तक कायम है।

मृत्युदंड के विपक्षियों का कहना है कि यह बहुत हद तक संभव है कि कानून को तोड़-मरोड़ कर और झूठी गवाही की बिना पर निर्दोष को फांसी दे दी जाए। इसके लिए आंकड़ों को आधार बनाकर बताया जाता है कि फांसी की सजा के शिकार बनने जा रहे लोगों में से अधिकांश गरीब वर्ग के लोग होते हैं या ऐसे लोग जो अपनी पैरवी के लिए वकील नहीं रख सकते।

इसके विपरीत, मृत्युदंड के पक्षधर अनेक आधारों पर विभिन्न सजाओं को श्रेणीबद्ध करते हैं। वह यह भी कहते हैं कि किसी अपराधी को मृत्युदंड दिया जाना उसे हमेशा के लिए कारागार में रखने से कहीं सस्ता सौदा होता है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भी मृत्युदंड को विभिन्न सभ्यताओं में अमल में लाया जाता रहा है। प्राचीन यूनानी, मिस्र और भारतीय सभ्यताओं में इस सजा के संदर्भ मिलते हैं, लेकिन उस समय इसे अमल में लाने के अजीबोगरीब तरीके थे। इसके पक्षधर इसे एक सबक के तौर पर भी मानते हैं, ताकि अन्य लोग सीख लें, लेकिन इसके बावजूद मृत्युदंड का भय अपराधों पर रोक नहीं लगाता।

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