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सोलर बैटरी

सोलर बैटरी फोटोवोल्टेक्स की मदद से सूर्य या प्रकाश के किसी अन्य स्रोत से ऊर्जा प्राप्त करती है। अधिकांश उपकरणों के साथ सोलर बैटरी इस तरह से नत्थी की जाती है कि वह उस उपकरण का हिस्सा ही बनकर रह जाती है और उससे अलग नहीं की जा सकती। सूर्य की रोशनी से एक या दो घंटे में यह पूरी तरह चार्ज हो जाती है।

सोलर बैटरी में लगे सेल प्रकाश को समाहित कर सेमीकंडक्टरों के इलेक्ट्रॉन्स को उस धातु के साथ क्रिया करने को प्रेरित करता है। एक बार यह क्रिया होने के बाद इलेक्ट्रॉन्स में मौजूद ऊर्जा या तो बैटरी में स्टोर हो जाती है या फिर सीधे इस्तेमाल में आती है। ऊर्जा के स्टोर होने के बाद सोलर बैटरी अपने निश्चित समय पर डिस्चार्ज होती है। या तो उसे कोई व्यक्ति ऑन करता है या फिर वह स्वचालित तरीके से ऑन होती है।

अधिकांशत लेड एसिड और निकल कैडमियम सोलर बैटरियां इस्तेमाल होती हैं। लेड एसिड बैटरियों की कुछ सीमाएं होती हैं कि वह पूरी तरह चार्ज नहीं हो पातीं, जबकि इसके विपरीत निकल कैडिमयम बैटरियों में यह कमी नहीं होती, लेकिन सह महंगी भी होती हैं।

सोलर बैटरियों को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत के तौर पर भी देखा जाता है। फिलहाल, इन्हें केवल छोटे इलैक्ट्रॉनिक उपकरणों में इस्तेमाल के योग्य समझा जा रहा है। पूरे घर को सोलर बैटरी से चलाना बेशक संभव हो, लेकिन इसके लिए कई सोलर बैटरियों की जरूरत होगी। इसकी विधियां तो उपलब्ध हैं, लेकिन यह अधिकांश लोगों के लिए बेहद महंगा सौदा साबित होगा।

बेहद छोटे उपकरणों जैसे कैल्कुलेटर्स में भी सोलर बैटरियों का इस्तेमाल होता है। लेकिन उनमें लगी बैटरियां बेहद छोटी होती हैं और अधिक ऊर्जा संग्रहित नहीं कर पातीं। इसके बावजूद यह ऊर्जा प्रवाह के आमतौर पर इस्तेमाल के तरीके जैसे तारों आदि के जंजाल से छुटकारा दिलाती हैं। इस मायने में यह बेहतर है।

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