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सौर घड़ी

सौर घड़ियों का इस्तेमाल सूर्य की दिशा से समय का पता लगाने के लिए किया जाता था। इन घड़ियों की कार्यशैली और क्षमता सीमित होती थी क्योंकि यह रात के समय काम नहीं करती थीं। इसके बावजूद, दुनिया में समय का पता लगाने के लिए सबसे पहले इनका इस्तेमाल किया गया था। इन्हीं घड़ियों को आधार बनाकर समय बताने वाली अन्य घड़ियों का आविष्कार हुआ था।

सबसे पहली सौर घड़ियां सुबह और दोपहर में ही काम करती थीं। इन घड़ियों की निर्माण विधि में एक बड़े स्तंभ को एक सिरे से बांधकर जमीन में गाड़ दिया जाता था और सूर्य के घूमने के साथ-साथ जमीन पर पड़ी स्तंभ की छाया से समय का अंदाज लगाया जाता था। मध्यान्ह के समय स्तंभ की छाया सबसे छोटी होती थी जिससे पता चलता था कि सूर्य ठीक आकाश के बीच में स्थित है। पश्चिमी एशिया और मिस्र की सभ्यताओं में ऐसी घड़ियों का बहुत इस्तेमाल किया गया था।

इसके बाद आविष्कर्ताओं ने और कई घड़ियों का निर्माण किया जिससे दिन के समय को कई पहर में बांटा जाने लगा था। हालांकि, वह पहर हमारे आज के घंटों से कुछ लंबे होते थे। कई सभ्यताओं में मौसमों के हिसाब से सौर घड़ियां समय बताने लगी और कई स्थानों पर तो वह दिन और रात की बराबर लंबाइयों जैसे दुर्लभ दिवसों को भी इंगित करने लगी थीं।

कई संस्कृतियों में मानवीय सौर घड़ियां भी बनीं जिसमें एक आदमी एक निश्चित स्थान पर खड़ा होता था और अपनी परछाईं के बदलते आकार से समय का पता लगाता था। दरअसल, सौर घड़ियों के सही काम करने के लिए यह जरूरी होता था कि उन्हें सही स्थानों पर स्थापित किया जाए। दुनिया के अलग-अलग स्थानों पर एक ही समय पर सूर्य भिन्न दिशाओं में होता था, इसलिए सूर्य की दिशा के हिसाब से स्थापित करना होता था। इसका एक तरीका यह है कि सौर घड़ी को इस तरह स्थापित किया जाए कि सूर्य के ठीक आकाश के बीच में होने पर परछाई बिल्कुल सीधी दिखे।

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