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सायबॉर्ग

फिल्म प्रेमियों ने हॉलीवुड की ‘स्टार ट्रेक’ और अन्य विज्ञान फंतासी फिल्मों में ऐसे मशीनी मानव दिखाए जाते हैं जिनका आधा शरीर इनसान और आधा मशीन होता है। विज्ञान के क्षेत्र और विज्ञान गल्प में ऐसे मानवों को सायबॉर्ग कहा जाता है।

इस शब्द का पहली बार इस्तेमाल 1960 में मैन्फ्रेड क्लिंस और नैथन क्लाइन ने बाहरी अंतरिक्ष में मानव-मशीनी सिस्टम के इस्तेमाल के संदर्भ के एक आलेख में किया था। इसके बाद 1965 में डी.एस. हेलेसी ने अपनी पुस्तक ‘सायबॉर्ग : एवोल्यूशन ऑफ द सुपरमैन’ में इस बारे में कुछ अलग तरीके से विमर्श सामने रखा। कुल मिलाकर सायबॉर्ग की परिकल्पना एक ऐसे जीवित ऑर्गेनिज्म की है जिसमें तकनीक के कारण कुछ असाधारण क्षमताएं हैं।

विज्ञान कथाओं और फिल्मों में सायबॉर्ग के संबंध में मानवीय और मशीनी अंतर्द्वद्व को दर्शाया गया है। कथाजगत और फिल्मों में दिखाए जाने वाले सायबॉर्ग अमूमन इनसानों से बिल्कुल अलग दिखाए जाते हैं। उन्हें योद्धाओं की छवि वाला भी दिखाया जाता है। इसके अतिरिक्त बौद्धिक स्तर पर भी वे इनसानों से बेहतर दिखाए जाते हैं।

इसके विपरीत, असली सायबॉर्ग वे जीवित प्राणी होते हैं जो किसी शारीरिक या मानसिक कमी को दूर करने के लिए साइबनेटिक तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। आमतौर पर सायबॉर्ग को इनसानों से ही जोड़कर देखा जाता है, लेकिन वे कोई भी जीव हो सकते हैं।

कुछ परिभाषाओं में शरीर में लगाए गए किसी भी उपकरण यानी पेसमेकर या इंसुलिन पंप के बाद उस व्यक्ति को सायबॉर्ग कहा जा सकता है क्योंकि यह उपकरण जैविंक अंगों की कार्यक्षमता में वृद्धि करते हैं। लेकिन कई वैज्ञानिक भिन्न मत रखते हैं। 

उनकी राय में सायबॉर्ग के कई प्रकार हो सकते हैं जैसे इंडिविजुअल और सोशल। पहले प्रकार में किसी व्यक्ति के शरीर में लगे तकनीकी उपकरण उसकी क्षमता बढ़ाते हैं जबकि दूसरी श्रेणी में विशाल नेटवर्क, शहरों का यातायात, मार्केट आदि को शामिल किया जाता है।

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