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ग्लूकोमा

कल यानी 12 मार्च को विश्व ग्लूकोमा दिवस है। ग्लूकोमा यानी कालामोतिया धीरे-धीरे अपना असर छोड़ता है। कालामोतिया चार तरह का होता है - ओपन एंगल, एंगल क्लोजर, सेकेंडरी और बच्चों को होने वाला कालामोतिया। दरअसल, हमारी आंख में एक तरल पदार्थ भरा होता है। इससे लगातार एक तरल पदार्थ आंख के गोले को चिकना किए रहता है। अगर यह तरल पदार्थ रुक जाए तो इंट्राऑक्यूलर प्रेशर बढ़ जाता है।

कालेमोतिया का कारण डॉक्टर ही पहचानता है। नियमित जांच से इसकी पहचान हो सकती है। कालेमोतिये के दौरान रोगी को सिरदर्द, मितली और धुंधला आना शुरू हो जाता है। कई रोगियों को रात में दिखना बंद भी हो जाता है। टय़ूब लाइट या बल्ब की रोशनी चारों ओर से धुंधली दिखने लगती है। आंखों में तेज दर्द भी होने लगता है। ओपन एंगल ग्लूकोमा में चश्मे के नंबर तेजी से बदलना पड़ता है। जांच के दौरान डॉक्टर ऑप्टिक नर्व के दिमाग से जुड़ने वाले स्थान पर होने वाले परिवर्तन की जांच करते हैं।

आमतौर पर 20 से 29 वर्ष आयु के सभी व्यक्तियों को प्रतिवर्ष अपनी आंखों की जांच कराते रहना चाहिए। ग्लूकोमा के इलाज की भी कई विधियां हैं जिनमें आंखों में दवा डालना, लेजर ट्रीटमेंट और सजर्री शामिल हैं। यदि ग्लूकोमा पीड़ित उसके प्रति लापरवाही बरते तो आंखों की रोशनी भी जा सकती है। इसलिए इलाज में कोताही नहीं बरतनी चाहिए। वैसे डॉक्टरों की राय में सजर्री उन्हीं रोगियों के लिए जरूरी होती है जिनका

कालामोतिया एडवांस स्टेज में पहुंच चुका होता है। ऐसे रोगियों में तरल दवा अधिक असर नहीं छोड़ती। कालेमोतिया का लेजर से भी ऑपरेशन किया जाता है। कई मामलों में यह बीमारी आनुवांशिक असर छोड़ती भी देखी गई है। एक आंख में यदि काला मोतिया उतरा है तो उसके दूसरी आंख में भी होने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए इसकी प्रारंभिक आईओपी जांच के नतीजों को गंभीरता से लेना चाहिए।

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